वास्तव में हम यह भी नहीं जानते कि इंसानों ने बोलना कैसे शुरू किया। जानवरों की भाषा को (यदि ऐसी किसी चीज का अस्तित्व है) समझने की कोशिश में एक और दिक्कत यह है कि हम पूरी तरह इंसान की अपनी भाषा के बारे में भी नहीं जानते। न ही हमें यह पता है कि इसका विकास कैसे हुआ। हमें असल में यह नहीं मालूम कि कैसे और क्यों हमने संचार की ऐसी व्यवस्था बनाई जो दूसरे जानवरों से इतनी अलग है।
एक सिद्धांत यह है कि हमारी भाषा धीरे-धीरे विकसित हुई, जिसकी शुरुआत शारीरिक संकेतों और हाव-भाव से हुई। फिर हमने कुछ ध्वनियां निकालीं, जब तक कि पूरी शब्दावली तैयार नहीं हो गई। एक और सिद्धांत कहता है कि इंसानी भाषा चिड़ियों के गीत की तरह शुरू हुई। इसमें ध्वनियों की एक जटिल श्रृंखला है जिसमें उसका अर्थ निहित है, लेकिन यदि इन दो में से कोई एक बात भी सही है तो सवाल है कि दूसरी प्रजातियों ने इसी तरह अपनी भाषा क्यों नहीं विकसित की? क्या कोई भी दूसरा जीव भाषा का वैसा ही इस्तेमाल करता है जैसा हम करते हैं- सिर्फ बाहरी उत्तेजनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए नहीं, बल्कि अपने अमूर्त विचारों को व्यक्त करने और रचनात्मकता जगाने के लिए?
आखिर इंसानों में कैसे विकसित हुई हंसने की कला, क्या जानवर भी खिलखिलाते हैं?
पशु भाषाविद?
जानवरों के संकेतों का अनुवाद करके उसे समझने के प्रयासों में हम कितना आगे बढ़े हैं? सांकेतिक भाषा के 1000 संकेतों में महारत हासिल करने वाली मशहूर गोरिल्ला कोको के बारे में गहराई से छानबीन हुई है। विज्ञान के कुछ क्षेत्रों में यह महसूस किया गया कि कोको को वास्तव में इस बात की बहुत कम या बिल्कुल भी समझ नहीं थी कि उसके इशारों का असल मतलब क्या है।
एक और उदाहरण तोते का है जो 100 शब्दों को सीख और बोल सकते हैं। वे अपनी जरूरतों और इच्छाओं को व्यक्त कर सकते हैं, जैसे भोजन की जरूरत। लेकिन शोधकर्ताओं को यह मालूम नहीं है कि क्या उनको वाकई इन शब्दों की समझ है। क्या यह सिर्फ सीखा हुआ व्यवहार है? वैज्ञानिक डॉल्फिन, हाथी, ह्वेल, घोड़े, कुत्ते और बंदरों के साथ भी बुनियादी किस्म की संचार समझ व्यक्त करने में सक्षम हैं।
तकनीक का विकास करने से हमें जानवरों के बारे में हमारी समझ बढ़ाने में कैसे मदद मिलेगी? पिछले कई साल से, कंपनियां यह दावा कर रही हैं कि उन्होंने जानवरों की भाषा का अनुवाद करने वाले एप या इंटरफेस बना लिए हैं। लेकिन ऐसे कई दावे खारिज हो गए या वे बहुत ही बुनियादी किस्म के संचार के बारे में ही मददगार हैं (जैसे मेरा कुत्ता गुस्से में है, उदास है या नींद में है)।
मशीनों की कृत्रिम बुद्धि और डीप लर्निंग एल्गोरिद्म के विकास ने बड़े डाटा का इस्तेमाल करके जानवरों की शब्दावली तैयार करने के विचार को आगे बढ़ाया है। दशकों से प्रेयरी डॉग (चूहों की नस्ल के जीव) की ध्वनियों का अध्ययन कर रहे एक शोधकर्ता को यकीन है कि अगले दस साल के अंदर पालतू कुत्तों की आवाज का अनुवाद करने वाली मशीन उपलब्ध होगी। लेकिन समस्या बनी हुई है। हम कभी यह कैसे जान पाएंगे कि हम जिसे कुत्ते का भौंकना समझते हैं वहां असल में कुत्ते कुछ बताना चाहते हैं?
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क्या कभी कोई जानवर हमें यह बता पाएगा कि हमारा अनुवाद सटीक है? और क्या हमें कभी जानवरों को समझने का प्रयास करना चाहिए? खेतों में काम करने वाले जानवरों या पालतू जानवरों के मामले में मुमकिन है कि वे ऐसा कुछ कहें जिसे हम सुनना न चाहें।