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दुनिया से अगर कीड़े खत्म हो जाएं तो क्या इंसान भी मर जाएंगे?

Sun, 26 Jan 2020 02:13 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मक्खियां, मच्छर और तमाम दूसरे कीड़े-मकोड़े जब हमारे घरों, खाने के ऊपर मंडराते हुए दिखते हैं तो बेशक हमें गुस्सा आता है। कभी-कभी हम उन्हें मारने के तमाम इंतजाम भी करते हैं। लेकिन आगे से जब भी आप ऐसा करने वाले हों तो आपको ऐसा करने से पहले दो बार सोचना चाहिए, क्योंकि कीड़ों की आबादी दुनिया भर में तेजी से कम हो रही है। कीड़े हमारे वातावरण के संरक्षण और खाद्य पदार्थों के उत्पादन में भी अहम भूमिका निभाते हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लंदन के नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम की सीनियर क्यूरेटर डॉ. एरिका मेकलिस्टर कहती हैं, 'अगर हम दुनिया से सारे कीड़ों को खत्म कर दें तो हम भी खत्म हो जाएंगे।' अगर आप ये पूछें कि कीड़ों का काम क्या है तो सबसे अहम काम ये है कि कीड़े जैविक संरचनाओं को तोड़कर उनके अपघटन यानी खत्म करने की प्रक्रिया को तेज करते हैं। कीड़े इस तरह मिट्टी में भी उर्वरकों का संचार करते हैं। मेकलिस्टर कहती हैं, 'कल्पना करिए कि अगर हमारी दुनिया में मल के निस्तारण के लिए कीड़े न हों तो क्या होगा...बेशक दुनिया बेहद खराब होगी। कीड़ों के बिना हमारे आसपास मल ही मल होगा और मरे हुए जानवरों की लाशें...'

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कीड़े पक्षियों, चमगादड़ों और छोटे जानवरों के लिए भी खाने का इंतजाम करते हैं। वहीं, सिडनी यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉ. फ्रांसिस्को सांचेज बायो बताते हैं, 'लगभग साठ फीसदी रीढ़ की हड्डी वाले जीव अपने भोजन के लिए कीड़ों पर निर्भर हैं। पक्षियों, चमगादड़ों, मेढकों और साफ पानी की कई मछलियां भी गायब हो रही हैं। पोषक तत्वों की रिसाइकिलिंग का दारोमदार पूरी तरह जमीन और पानी में नीचे रहने वाले लाखों कीड़ों की गतिविधियों पर निर्भर है और इसमें समुद्रों में रहने वाले लोग शामिल नहीं हैं।' 

 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दूसरे जीवों के लिए खाने का सामान बनने के साथ-साथ अपघटन करने के अलावा कीड़े परागण के लिए भी बहुत जरूरी हैं, क्योंकि खाद्य उत्पादन के लिए परागण बेहद जरूरी है। एक अध्ययन के मुताबिक, कीड़ों की वजह से दुनिया को 350 अरब अमेरिकी डॉलर का फायदा होता है। डॉ. बायो कहते हैं, 'फूल देने वाले ज्यादातर पौधों को परागण की जरूरत होती है। इसके साथ ही फसल वाले 75 फीसदी से ज्यादा पौधे भी परागण पर निर्भर हैं।' इसके बावजूद भी हम अक्सर कीट पतंगों से होने वाले फायदों को लेकर अनभिज्ञ रहते हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
डॉ. मेकलिस्टर कहती हैं, 'चॉकलेट के पौधे की परागण में मदद करने वाले 17 कीट-पतंगे होते हैं। इनमें से 15 छोटी मक्खियां होती हैं जिन्हें हर कोई नापसंद करता है। एक छोटी सी चींटी है। एक बहुत ही छोटा कीट होता है लेकिन हम इनके बारे में कितना कम जानते हैं।' जंगली मधुमक्खियों की बात करें तो दुनिया के कई देशों में इनकी संख्या में गिरावट आ रही है। तितलियों की सुप्रसिद्ध प्रजातियों में से एक मोनार्क तितली, जो कि कई जंगली फूलों के परागण में भूमिका निभाती है, की संख्या में भी काफी कमी आ रही है। लेकिन एक सवाल ये उठता है कि क्या हम कीट-पतंगों की संख्या में कमी आने की समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं? 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या आपको पता है कि दुनियाभर में कीड़ों की संख्या कितनी है? अमेरिकी संस्था स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूटशन के मुताबिक, कीट पतंगों का कुल भर इंसानों के कुल भार का 17 गुना है। इस संस्था के मुताबिक, पूरी दुनिया में अगर कभी भी कीड़ों की संख्या गिनी जाए तो ये संख्या 10 अरब अरब होगी...अंकों में लिखें तो 10,000,000,000,000,000,000। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
संरक्षणवादियों के मुताबिक, कीट-पतंगों की प्रजातियों की संख्या दो से तीस मिलियन के बीच है, लेकिन स्तनधारी जीवों के मुकाबले कीट-पतंगों पर शोध काफी सीमित रहा है। स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूट के मुताबिक, हम इस समय सिर्फ नौ लाख अलग-अलग कीट-पतंगों के बारे में जानते हैं और यही नंबर दुनियाभर के जीवों की प्रजातियों में से 80 फीसदी का प्रतिनिधित्व करता है। कीट-पतंगे में इतनी विविधता और बड़ी आबादी भी उनके सामूहिक विनाश रोकने में मददगार साबित नहीं हो रही है। कई कीट-पतंगे अपनी खोज और नाम दिए जाने से पहले ही गायब हो रहे हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
डॉ मेकलिस्टर कहती हैं, 'हमारे पास कई ऐसे उदाहरण हैं जिनका पता 1930 और 1940 के दशक में लगाया गया था, लेकिन अभी भी उनकी पहचान किया जाना बाकी है। इन कीट-पतंगों के रहने के स्वाभाविक स्थान कई साल पहले खत्म हो चुके हैं।' साल 2019 के फरवरी महीने में जर्नल बायोलॉजिकल कंजरवेशन में प्रकाशित एक रिपोर्ट एक डरावने कल की तस्वीर दिखाती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी, ब्रिटेन और प्यूर्टो रिको में कीट-पतंगों का बायोमास हर साल ढाई फीसदी की दर से घट रहा है। ये वो देश हैं जहां कीट-पतंगों की संख्या पर बीते 30 सालों से अध्ययन जारी है। इस रिपोर्ट के सह-लेखक डॉ. बायो बताते हैं, 'वो सभी जगहें जहां पर कीट-पतंगों की आबादी पर शोध किया गया है, वहां से ये पता चलता है कि 41 फीसदी प्रजातियों की आबादी में कमी आ रही है। कीट-पतंगों की एक छोटे से समूह की आबादी में बदलाव नहीं दिखता है। वहीं कीट-पतंगों की प्रजातियां के एक बहुत छोटे से हिस्से की आबादी बढ़ रही है। शायद ये इस वजह से है क्योंकि ये प्रजातियां विलुप्त होते जीवों की जगह ले रही हैं।'

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
साल 2017 में सामने आए एक अध्ययन में सामने आया कि बीते 30 सालों में जर्मनी के 60 संरक्षित क्षेत्रों में पतंगों की संख्या में 75 फीसदी से ज्यादा कमी आई है। वहीं, एक अमेरिकी शोधार्थी ने अपने शोध में पाया है कि प्यूर्टो रिको के कैरिबियन द्वीप में बीते चार दशकों में 98 फीसदी की कमी आई है। इस दर पर कीट-पतंगों की कई प्रजातियां जल्द ही खत्म हो सकती हैं। डॉ बायो कहते हैं, 'अगर मौजूदा ट्रेंड्स को ठीक नहीं किया गया तो हम एक देश के अंदर कीट-पतंगों की प्रजातियों में भारी विलुप्तीकरण देखेंगे।'

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ज्यादा खेती होने की वजह से कीट-पतंगों के रहने के स्थानों में कमी आने को उनके विलुप्तीकरण का मुख्य कारण माना जा रहा है। कॉफी के पेड़ों के परागण में भूमिका निभाने वाले पतंगे इसका उदाहरण हैं। डॉ. मेकलिस्टर बताती हैं, 'इन छोटे-छोटे जीवों को अपने वयस्क जीवन के लिए पेड़ चाहिए होते हैं। इनके लार्वा सड़ती हुई पत्तियों में रहते हैं। अगर आप ऐसे छांवदार पेड़ों को खत्म कर देगें तो आप वो जगहें भी खत्म कर देते हैं जो इन कीट-पतंगों की अगली पीढ़ी के विकास के लिए जरूरी होते हैं।'

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पौधों और कृषि में कैमिकल पेस्टिसाइड, ग्लोबल वॉर्मिंग और तेजी से बढ़ती प्रजातियां भी कीट-पतंगों की आबादी कम होने के कारक हैं। इस पूरी कहानी में बुरी बात ये है कि कॉकरोच जैसे कीड़े-मकोड़े इस मुसीबत का सामना करने में सक्षम दिखते हैं, क्योंकि उन्होंने कई पेस्टिसाइड से मुकाबला करने के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। 

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ससेक्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेव गॉल्सन के मुताबिक, आने वाले सालों में कॉकरोचों की संख्या में बढ़ोतरी होने की संभावना है। वे बताते हैं, 'तेजी से प्रजनन करने वाले पीड़क कीट-पतंगे ग्लोबल वॉर्मिंग होने की वजह से तेजी से बढ़ेंगे, क्योंकि उनके ज्यादातर स्वाभाविक शत्रु, जिनका प्रजनन समय लंबा होता है, विलुप्त हो जाएंगे। ये संभव है कि हमें किसी तरह के पीड़क कीट-पतंगे के प्लेग का सामना करना पड़े, लेकिन हम उन सभी कीट-पतंगों जैसे तितलियां, मक्खियां और टिड्डे जैसे बेहतरीन कीट-पतंगों को खो देंगे।'
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वैज्ञानिकों का मानना है कि मानवजाति के पास अभी भी सही कदम उठाने का समय शेष है। डॉ. बायो बताते हैं, 'इन कदमों में पेड़ लगाना, खेतों में फूलों वाले पौधे लगाना, खतरनाक पेस्टिसाइड पर रोक, और कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। अगर लोग ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थ खाना शुरू कर दें तो वो भी कीट-पतंगों का भविष्य बदलने में कारगर सिद्ध हो सकता है। ऐसा करना किसानों को पेस्टिसाइड इस्तेमाल करने से रोकेगा और पर्यावरण पर जहरीले तत्वों का असर कम करेगा।' 
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