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Patal Lok: पृथ्वी के इस हिस्से में मिल गया पाताल लोक का दरवाजा! वैज्ञानिकों ने कही ये बात

Fri, 19 Sep 2025 02:39 PM IST
संकल्प सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

रोचक बात यह भी है कि भारत के अलावा दुनिया की कई दूसरी सभ्यताओं में भी धरती के नीचे बसे रहस्यमयी लोकों का जिक्र किया गया है। अब सवाल यह है कि पाताल लोक केवल धार्मिक या आध्यात्मिक अवधारणा है या सच में इसका कोई अस्तित्व है?
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What is the mystery of patal lok - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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भारतीय पौराणिक ग्रंथों में पाताल लोक का जिक्र कई बार मिलता है। रोचक बात यह है कि भारत के अलावा दुनिया की कई दूसरी सभ्यताओं में भी धरती के नीचे बसे रहस्यमयी लोकों का जिक्र किया गया है। अब सवाल यह है कि पाताल लोक केवल धार्मिक या आध्यात्मिक अवधारणा है या सच में इसका कोई अस्तित्व है? इसका कोई वैज्ञानिक आधार है? भूविज्ञान के मुताबिक धरती के नीचे क्रस्ट, मेंटल और कोर है। यहां पर जीवन की संभावना न के बराबर है। फिजिक्स ऑफ द अर्थ एंड प्लानेटरी इंटीरियर्स जर्नल में प्रकाशित हुई स्टडी ने इस बारे में बताया कि पृथ्वी का कोर मोल्टन और सेमी सॉफ्ट पदार्थ से मिलकर बना है। यहां पर तापमान और प्रेशर इतना ज्यादा है कि कोई इंसान तो क्या यहां किसी उपकरण को भी पहुंचाना काफी मुश्किल काम है।

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इस कारण धरती के नीचे क्या सच में कोई पाताल लोक है या नहीं, इस बारे में पुख्ता तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता है। वहीं पुरातत्वविदों को कुछ समय पहले अमेरिका के होंडुरास में सियुदाद ब्लांका नामक एक प्राचीन शहर के अवशेष मिले। इसकी गुफाओं में मंकी गॉड की मूर्तियां मिलीं।

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कई लोगों ने इसका संबंध हनुमान जी और रामायण में जिक्र किए गए पातालपुरी से जोड़ा। हालांकि, यह दावा भी वैज्ञानिक और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में पातालकोट नामक एक घाटी है। यहां कुल 12 गांव हैं। यह घाटी काफी गहराई में है। यहां दोपहर के बाद ही अंधेरा हो जाता है।

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कई मान्यताएं कहती हैं कि पातालकोट ही पाताल जाने का रास्ता है। कुछ किंवदंतियों के मुताबिक माता सीता ने यहीं से धरती में प्रवेश किया था। इस कारण जमीन नीचे की ओर धंस गई। मान्यताएं यह भी कहती हैं कि भगवान राम और लक्ष्मण को अहिरावण के यज्ञ से बचाने के लिए हनुमान जी उन्हें यहीं से पाताल लोक लेकर गए थे।

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पृथ्वी पर इस तरह की कई जगहें मौजूद हैं, जिनका दावा पाताल लोक तक जाने के रूप में किया जाता है। हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अब तक कहीं कोई पुष्टि नहीं हुई है। ये सब बातें मान्यताओं और किंवदंतियों पर आधारित हैं।
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