जेट एयरवेज़ ने इस हादसे पर बयान जारी करते हुए कहा है, ''गुरुवार की सुबह फ़्लाइट का केबिन प्रेशर बिगड़ने के कारण फ़्लाइट की वापस लैंडिंग कराई गई। हमें यात्रियों की असुविधा के लिए खेद है। बोइंग 737 एयरक्राफ्ट में कुल 166 यात्री और पांच क्रू मेंबर सवार थे। सभी लोगों को सुरक्षित उतारा जा चुका है। जिन लोगों को नाक और कान से खून की शिकायत मिली उन्हें तुरंत प्राथमिक उपचार मुहैया कराया गया।''
आख़िर केबिन प्रेशर होता क्या है और इसके कम होने से नाक और कान से खून निकलने जैसी समस्याएं क्यों होती है।
हम इंसानों को जीने के लिए ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है, जैसे-जैसे हम ऊँचाई पर जाते हैं, हमें ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है। धरती से ऊपर बढ़ने पर हवा का दबाव भी कम होने लगता है। ऊपर हवा का दबाव कम होने पर ऑक्सीजन के कण बिखरने लगते हैं। समुद्र तल से 5।5 किलोमीटर ऊपर ऑक्सीजन की मात्रा क़रीब आधी हो जाती है। करीब सात किलोमीटर ऊपर ऑक्सीजन की मात्रा एक-तिहाई रह जाती है। समुद्र तल से करीब 2।5 किलोमीटर ऊपर उड़ान भरने पर इंसान को कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं, जैसे सिरदर्द, उल्टी और जी मचलाना।
सभी विमान अंदर से प्रेशर को नियंत्रित रखते हैं ताकि लोग आराम से सांस ले सकें जबकि विमान के बाहर दबाव काफ़ी कम होता है। विमान में ऑक्सीजन की टंकी नहीं ले जाई सकती इसलिए ऊपर आसमान में मौजूद ऑक्सीजन को विमान के अंदर इकट्ठा करने की कोशिश की जाती है।विमान के इंजन से जुड़े टरबाइन बाहर के ऑक्सीजन को कंप्रेस कर अंदर लाते हैं। इंजन से होकर गुज़रने की वजह से हवा का तापमान बहुत अधिक हो जाता है जिसकी वजह से इसे सांस ले पाना मुश्किल होता है। ऐसे में कूलिंग तकनीक से इसे ठंडा किया जाता है, जिसकी वजह से इसमें आर्द्रता कम होती है।
अगर केबिन में किसी वजह से प्रेशर कम होता है तो सीट के ऊपर एक अतिरिक्त ऑक्सीजन मास्क की व्यवस्था होती है, जिसे ज़रूरत पड़ने पर यात्री इस्तेमाल कर सकते हैं।