जनजातियां कहने से ही हमारे ज़हन में तस्वीर उभरती है ऐसे लोगों की जो मानव विकास के क्रम में अभी भी आखिरी पायदानों पर खड़े हैं और अभी भी पुरानी परंपराओं के साथ जी रहे हैं। न उनकी जीवन शैली बदली है और न सोचने का ढंग।
यही वजह है कि उनकी मान्यताएं, परंपराएं और जीवनशैली हमें चकित करती हैं। कई बार डराती भी हैं।
उनके कपड़े पहनने का ढंग हमें अजीब लगता है तो सुंदरता की उनकी परिभाषा भी। वे संबंधों को भी अलग तरह से देखते हैं, चाहे तो शारीरिक संबंध हों या फिर सामाजिक।
इनमें से कुछ दक्षिण अफ्रीका में हैं, तो कुछ ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में। आइए जानते हैं दुनिया भर में प्रचलित जनजातियों की अजीबोगरीब परंपराओं के बारे में।
पुरुषार्थ की निशानी: मगरमच्छ वाली पीठ
साउथ अफ्रीका में तीन हजार से भी ज्यादा जनजातियां रहती हैं। इसे दुनिया में सबसे ज्यादा जनजातियों वाला देश माना जाता है साथ ही सबसे खूबसूरत भी। प्रकृति की गोद में रहने वाले ये लोग अपनी रंग-बिरंगी वेशभूषा, अजीबोगरीब खान-पान और सबसे ज्यादा अपनी कट्टर परंपराओं के लिए जाने जाते हैं।
एक ऐसी ही एक जनजाति है जो पापुआ न्यू गिनी में रहती है। इनका नाम सेपिक है।
सेपिक जनजाति में लड़के जब किशोरावस्था पूरी कर रहे होते हैं तब उन्हें गबरू जवान या सच्चा पुरूष बनाने के नाम पर उनके साथ एक दर्दनाक परंपरा का पालन किया जाता है। उनकी पीठ, छाती और कूल्हे पर मगरमच्छ की खाल जैसे निशान उकेरे जाते हैं। इन पर छोटे नुकीले पत्थर या फिर चाकू की मदद से एक खास तरह की डिजाइन बनाई जाती है। लड़कों को ऐसा करवाना जरूरी होता है।
ये प्रक्रिया दर्द से भरी होती है। लड़के खून से लथपथ हो जाते हैं और दर्द से कराहते रहते हैं। वो कई दिनों तक ठीक तरह से बैठ भी नहीं पाते। लेकिन उनके प्रति किसी को सहानुभूति नहीं होती। उल्टे मर्द उस लड़के को घेरकर खड़े होते हैं और तरह-तरह से उसका हौसला बढ़ाते हैं। मजाक करके, चिढ़ाकर या फिर खिल्ली उड़ाकर।
कई बार जब लड़के दर्द के मारे रोने लगते हैं तो उन्हें लड़की होने का ताना दिया जाता है। ऑस्ट्रेलिया के कई भागों में जनजातियों में इसका चलन था लेकिन आर्नहेम लैंड नाम की जगह पर इसे प्रतिबंधित कर दिया गया।
बिस्तर पर चाहिए ऐसे ही मर्द
कहने की आवश्यता नहीं कि गबरू जवान ही दुनिया के हर इलाके में स्त्रियों को पसंद होता है। साउथ अफ्रीका के मॉय जनजाति के बारे में एक अजीबोगरीब बात यह है कि वहां स्त्रियों के साथ हमबिस्तर होने के लिए पुरुषों को खतना करवाना जरूरी होता है क्योंकि उसके बिना स्त्रियां किसी के साथ सोने को तैयार नहीं होतीं।
उन्हें ऐसे ही मर्द से शारीरिक संबंध बनाना रास आता है जिनका खतना हो चुका हो। वे मानती हैं कि इसी से उन्हें चरमसुख की प्राप्ति होगी। डेली मेल के अनुसार लूओ, तुर्काना, इतेसो और लुहिया जनजातियों के पुरूषों के लिए अपना खतना करवाना आवश्यक होता है।
खतना की प्रक्रिया में पुरुषों के जननांग के सामने के हिस्से की चमड़ी को काटकर अलग कर दिया जाता है। वैसे तो अब आधुनिक प्रक्रिया के जरिए भी ऐसा किया जाता है लेकिन इन जनजातियों में यह प्रक्रिया बेहद दर्द भरी और खूनी होती है। इतनी कठिन कि कई मर्द इससे बचने के लिए पुलिस मदद भी मांगते हैं। लेकिन अधिकांश लोग अपनी संगिनी और अपनी जाति का मान रखने के लिए ऐसा करते हैं।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि खतना होने के बाद खुशी मनाई जाती है। बल्कि यों कहें कि इसके लिए अगस्त के शरुआती दिनों में होने वाले त्योहार को ही इसके लिए चुना जाता है। इस त्योहार को ये लोग खतना-मौसम के नाम से जानते हैं।
इस बार त्यौहार के दौरान तकरीबन दर्जन भर मर्दों ने ऐसा करवाया।
औरतें भी कम दिलेर नहीं
अगर आपको ऐसा लगता है कि केवल पुरूष ही सभी तरह के दर्द सहते हैं, तो आप गलत हैं। जनजातियों में औरतें भी एक से बढ़कर एक परंपराओं का निर्वहन करती हैं जो आपको आवाक छोड़ सकता है।
इस परंपरा का संबंध लड़कियों और महिलाओं की सुंदरता से है। जैसे कि उत्तर प्रदेश के कई समाज में आज भी लड़की का नाक छिदा होना अनिवार्य माना जाता है क्योंकि इसे उसकी सुंदरता और औरत कहलाए जाने की निशानी सा समझा जाता है।
ठीक ऐसे ही सूडान के नजदीक ईथोपिया में रहने वाली मुर्सी जनजाति की औरतें को होठों में लिप प्लेट डलवानी पड़ती हैं। क्ले या फिर लकड़ी से बनी ये प्लेट गोल होती हैं और कई बार आकार में बहुत बड़ी भी। इससे पहनना एक नियम माना जाता है।
बताया जाता है कि गुलामों की खरीद फरोख्त करने वाले पहले महिलाओं को अगवा करके ले जाते थे। महिलाओं के साथ ऐसा ना हो, इसलिए उन्हें बदसूरत बनाने की कोशिश की गई। इसके तहत उनके निचले होंठ में प्लेट लगाया जाने लगा। इस प्लेट का आकार वक्त-वक्त पर बढ़ाया जाता है। लेकिन अब, ये परंपरा इतनी पुरानी हो गई है कि इसे खूबसूरती से जोड़कर देखा जाता है।
इसमें खून भी बहुत बहता था और ये पीड़ादायी भी होता है। इस प्लेट के लगाए जाने के बाद महिलाओं को प्लेट पहने ही रहना होता है। वैसे अमेजन और ब्राजील की सुया जनजाति में मर्द भी छोटे लिप प्लेट लगवाते हैं। लेकिन अब ये परंपरा वहां खत्म होती जा रही है।
खतने के वक्त पहनते हैं गाय की ताजा खाल
त्योहार और जश्न तो समय ही होता है सजने संवरने का। लेकिन कई जनजातियों में इसे दर्दनाक परंपराओं से जोड़ दिया गया है।
जैसा कि हमने जिक्र किया था दक्षिण अफ्रीका में युवकों को अपनी संगिनी के लिए खतना करवाना होता है। ऐसा ही होता है दक्षिण अफ्रीकी देश कीनिया में।
कीनिया में बुंगोमा नाम की जगह पर बुकोसा और लुहया जनजाति के लड़कों का जब खतना किया जाता है तो उन्हें एक प्रक्रिया से गुजरना होता है।
सबसे पहले उन्हें ठंडे पानी में गोते लगाने होते हैं। जैसे ही लड़का ठंडे पानी से बाहर निकलकर आता है, वैसे ही उसके घरवाले एक गाय को मारकर उसकी खाल लड़के को ओढ़ा देते हैं। इस पूरे समारोह में गांववाले साथ ही में रहते हैं। बाद में लड़का गाय की ताजा खाल को पहनकर पूरे गांव के चक्कर काटता है। इसके बाद उसपर मिट्टी का लेप लगाया जाता है और एक कंबल से ढंकने के बाद उनका खतना कर दिया जाता है।
इस दौरान गाना-बजाना चलता रहता है।
इनकी तंदरुस्ती का राज भी है डराने वाला
वैसे तो इथोपिया की बोदी जनजाति गाय को भगवान की तरह पूजती है। लेकिन पुरुष मानते हैं कि उनकी तंदरुस्ती का राज भी गाय होती है।
इस जनजाति की खासियत है कि यहां पुरूष काफी मोटे होते हैं। ओमो वैली में बसी इसी जनजाति में पुरूष अपने आप को पोषित मानते हैं और इसके पीछे की वजह देते हैं गाय के खून को।
बोदी लोग एक त्यौहार मनाते हैं जिसका नाम है काइल। यह त्यौहार छह महीने तक चलता है। इस त्यौहार में जो पुरूष भाग लेता है, उसे आने वाले छह महीनों तक गाय के दूध और खून का घोल पीना होता है।
महीनों तक ऐसा करने से शरीर में काफी चर्बी जम जाती है और वे मोटे दिखने लगते हैं। लेकिन इतना पर्याप्त नहीं होता। हर किसी की कोशिश होती है कि वह सबसे मोटा हो जाए क्योंकि जो आदमी सबसे मोटा होता है, वही जनजाति का हीरो कहलाता है। हीरो बनने की बाजी लगभग सभी आदमी लगाते हैं और शौक से इसमें भाग लेते हैं।
बोदी जनजाति में औरतें भी निर्वस्त्र रहती हैं और मगरमच्छ नुमा डिजाइन अपनी छाती पर बनवाती हैं। इसे बनाने की प्रक्रिया भी दर्द भरी होती है।
खाते हैं ऐसी अजीबोगरीब व्यंजन
वैसे तो हर इलाके के लोगों का अपना एक पसंदीदा व्यंजन होता है जिसे वे नियमित रूप से पकाते खाते हैं। लेकिन जब बात जनजातियों पर आए तो इसमें आश्चर्य पैदा करने वाली चीज़ें जुड़ जाती हैं।
दक्षिण अफ्रीकी देश कीनिया के गांवों में 300 लोगों की एल मोलो जनजाति रहती है। एल मोलो केन्या की सबसे छोटी जनजाति है और उसे सबसे बहादुर जनजाति भी माना जाता है।
ये लोग मगरमच्छ और दरियाई घोड़े को पकड़कर खाते हैं। यही खाना इन्हें पसंद है। एल मोलो जनजाति के लोग लेक तुर्काना नाम की झील के किनारे रहते हैं। इस झील का पानी बहुत ही नमकीन होता है। खारा होने के बावजूद वो इसे पी लेते हैं।
हालांकि खानपान की इस परंपरा के नुकसान भी हैं। मगरमच्छ और दरियाई घोड़े खाने वाले ये लोग की औसत उम्र 40 वर्ष ही होती है। ये लोग 45 की उम्र से ज्यादा जी ही नहीं पाते। इसकी वजह इनके खान-पान और कड़ी जीवनशैली को माना जाता है। माना जाता है कि इनके बदन में कई जरूरी तत्व कम मात्रा में होते हैं जिससे उनकी मौत जल्दी होती है।
उनकी इस पसंद की वजह से हर साल तकरीबन एक लाख मगरमच्छों की मौत हो जाती है और अच्छी खासी संख्या में दरियाई घोड़े मारे जाते हैं। इसलिए इसका विरोध भी होता है।
अब सरकार ने अब एल मोलो पर प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें झील से मछलियां पकड़कर खाने को कहा है।
हांलाकि अब ये लोग कम से कम मगरमच्छों और दरियाई घोड़े को अपना शिकार बनाते हैं, लेकिन फिर भी इसे पूरी तरह से रोका नहीं जा सका है।
पूर्वजों का सम्मान लाशें उखाड़कर
पूवर्जों की इज्जत हर समाज करता है। बस तरीका अलग अलग होता है। कुछ उनकी तस्वीरें रखते हैं और पूजा करते हैं तो कुछ स्मारक बनाते हैं और कुछ उनकी कब्र पर फूल चढ़ाते हैं। भारत में तो पूर्वजों को याद करने के लिए बाकायदा पितृपक्ष ही होता है।
लेकिन पूर्वजों को याद रखने के मामले में इंडोनेशिया के साउथ सुलावासी में रहने वाले तोराजा जनजाति की तुलना किसी से नहीं की जा सकती।
ये लोग अपने पूर्वजों को हर साल उनकी कब्र से बाहर निकालते हैं और उन्हें नहला-धुलाकर, उन्हें बढ़िया कपड़े पहनाते हैं। यह प्रक्रिया सिर्फ गुजर चुके बुजुर्गों के लिए भर सीमित नहीं है बल्कि यह छोटे बच्चों के लिए भी ऐसी ही है।
हर साल किए जाने वाली इस सफाई को ये माईनेने नाम के त्योहार से जानते हैं। वो लोग मानते हैं कि मरे हुए का उसी गांव में जन्म जरूर होता है, इसलिए मरे हुए को कभी मरा हुआ नहीं मानना चाहिए।
टैटू से तय होता है रुतबा
टैटू से भी जनजातियों का अभिन्न रिश्ता है। बहुत सी जनजातियों में टैटू बनवाने या गुदना गुदवाने की प्रथा आम है.
आज भी ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड्स जैसे विकसित महाद्वीपों में ऐसी जनजातियां रहती हैं जिन्होंने कहने को तो अपने जीने के सलीके को एकदम मॉर्डन बना लिया है, पर आज भी टैटू बनवाना नहीं भूलते जो उनकी पहचान है।
न्यूजीलैंड में टा मोको नाम की जनजाति के लोग रहते हैं। जींस पहनने, मोबाइल इस्तेमाल करने और बर्गर खाने वाले ये लोग अजीबोगरीब ढंग से टैटू बनवाए रहते हैं।
कबीले की आन, बान, शान और पहचान के लिए बनवाया गया ये टैटू उनके लिए बहुत ही अहम होता है। इन टैटू को सुई की मदद से होंठ, नाक, पूरे चेहरे और कूल्हे पर बनवाया जाता है।
वैसे नई पीढ़ी अब इससे कतरा भी जाती है लेकिन परंपरा चल रही है।