प्रीमेन्स्ट्रुअल डिस्फॉरिक डिस्ऑर्डर यानी पीएमडीडी में हार्मोनल बदलाव आते हैं जिनका दिमाग़ पर भी असर पड़ता है। सामान्य तौर पर पीरियड्स के समय शरीर में हल्के-फुल्के परिवर्तन होते हैं, लेकिन पीएमडीडी में सामान्य से ज़्यादा दिमाग़ के अंदर केमिकल घटते-बढ़ते हैं। ये असंतुलन भावनात्मक लक्षण पैदा कर देता है।
मनोचिकित्सक संदीप वोहरा बताते हैं, ''पीएमडीडी के लक्षण पीरियड्स से दो-तीन दिन पहले दिखाई देने शुरू होते हैं। इसमें भावनात्मक और मानसिक लक्षण शारीरिक लक्षणों के साथ जुड़ जाते हैं। इस दौरान चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, तनाव, नींद न आना, बहुत ज़्यादा गुस्सा जैसे लक्षण दिखते हैं।''
''कुछ मामलों में महिलाओं को आत्महत्या के ख़याल भी आते हैं या वो गुस्से में दूसरों को नुकसान भी पहुंचा देती हैं। हालांकि, ऐसा बहुत कम मामलों में होता है।'' लेकिन, ज़रूरी नहीं कि इसमें हर महिला पर एक जैसा ही प्रभाव हो। जैसे छायानिका को पीरियड्स से पहले बहुत अकेलापन और चिड़चिड़ाहट होती है, लेकिन दिल्ली की रहने वालीं मानसी वर्मा का मामला कुछ मामला कुछ अलग है।
मानसी बताती हैं, ''मैं पीरियड्स से पहले बहुत उदासी महसूस करती हूं। पिछली बार पीरियड्स आने से पहले ही मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ था कि मैं दुखी हो जाऊं लेकिन फिर भी मैं बहुत उदास हो गई थी। मन कर रहा था कि कहीं भाग जाऊं लेकिन किससे भाग रही हूं ये पता नहीं था। आत्मविश्वास नहीं था और असुरक्षित महसूस कर रही थी। मेरा पूरा दिन रोते हुए बीता।"
अक्सर लोग पीएमएस और पीएमडीडी का अंतर समझ नहीं पाते। दोनों में कुछ मानसिक लक्षणों के अंतर के साथ-साथ उनकी गंभीरता का अंतर होता है।स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉक्टर अनीता गुप्ता कहती हैं, ''पीएमएस में पीरियड्स के साइकिल को संतुलित करने वाले हार्मोन में थोड़ा असंतुलन आ जाता है। इससे ब्रेस्ट में दर्द, बुख़ार और उल्टी हो सकती है। लेकिन, इसका भावनात्मक और मानसिक प्रभाव इतना ज़्यादा नहीं होता कि उसका सामाजिक जीवन पर प्रभाव पड़ जाए।''
''पीएमएस में सिर्फ़ विटामिन दे देते हैं लेकिन पीएमडीडी में पूरी तरह इलाज़ चलता है और काउंसलिंग की ज़रूरत भी पड़ती है। पीएमएस के लक्षण पीरियड्स से 5-6 दिन पहले शुरू होते हैं और पीरियड्स के दौरान भी रहते हैं। ये बहुत हल्के होते हैं।'' प्रीमेन्स्ट्रुअल डिस्फॉरिक सिन्ड्रॉम के लक्षण पीरियड्स से दो-तीन दिन पहले दिखाई देने शुरू होते हैं। इसमें शारीरिक लक्षणों के साथ भावनात्मक और मानसिक लक्षण भी जुड़ जाते हैं। इसका मानसिक प्रभाव ज़्यादा होता है।
डॉ. अनीता बताती हैं कि पीएमडीडी में मूड स्विंग बहुत ज़्यादा होते हैं। महिलाएं समाज से अलग-थलग महसूस करती हैं और काम पर भी इसका असर पड़ता है। अगर लक्षण बहुत ज़्यादा हैं और डॉक्टर को न दिखाया जाए तो महिला पूरी तरह डिप्रेशन में जा सकती है या खुद को नुकसान या दूसरों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। हालांकि, ऐसे मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं।