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वो गांव जिसे अमेरिका ने समझ लिया था मिसाइल गोदाम, बाहरी लोगों का यहां घर में घुसना है मना

Wed, 11 Dec 2019 04:54 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
ये दुनिया रंग-बिरंगी है। आप किसी भी देश में घूमने निकल जाएं, हमें हैरान करने वाले तमाम छोटे-बड़े अजूबे मिल जाते हैं। चीन को ही ले लीजिए। चीन के पूर्वी इलाके में स्थित फुजियान प्रांत में ऐसे ही अजूबे जंगलों और पहाड़ों के बीच छुपे हुए हैं। ये अजूबे हैं मिट्टी के बने किले, जिन्हें स्थानीय भाषा में टुलो कहा जाता है। टुलो का मतलब होता है, मिट्टी की बनी इमारतें। ये कोई आम इमारतें नहीं हैं। असल में ये विशाल किले हैं, जिनके भीतर बस्तियां आबाद हैं। हर इमारत के अंदर कई-कई मुहल्ले बसे हुए हैं। 
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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
बाहर से देखने पर कोई भी टुलो आपको आम मिट्टी की इमारत जैसा ही लगेगा। मगर अंदर घुसने पर हमें पता चलता है कि ये तो किले जैसा है। अंदर मुहल्ले के मुहल्ले बसे हुए हैं। पूरी जिंदगी इन्हीं के भीतर गुजरती है। आम तौर पर टुलो एक आंगन के इर्द-गिर्द बनाया जाता है। इसके चारों तरफ घेरेबंदी जैसी करके तीन से चार मंजिला इमारत खड़ी की जाती है। बाहर से ये बेहद मजबूत होते हैं। किसी खतरे की सूरत में ये मजबूत दीवारें, भीतर रहने वाले लोगों की सुरक्षा करती हैं। इन शानदार इमारतों के भीतर आबाद लोग, इन दीवारों के अंदर खुद को और अपनी परंपरा को महफूज रखते आए हैं। 
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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
बाहरी दुनिया के लोगों का इनके भीतर जाना मना था। टुलो के अंदर जाने पर आपको कतार से बने लकड़ी के बने कमरे मिलेंगे। आम तौर पर ग्राउंड फ्लोर पर किचेन बने होते हैं। इनके ऊपर की मंजिल पर अनाज रखने का इंतजाम होता है। इनके ऊपर की दो मंजिलें बेडरूम के तौर पर इस्तेमाल होती हैं। सैकड़ों सालों से यहां लोग रह रहे हैं। 

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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
शीत युद्ध के दौरान इन किलों को अमेरिका ने मिसाइल सिलो समझ लिया था, जहां मिसाइलें छुपाकर रखी गई थीं। बाद में जाकर इनकी सच्चाई दुनिया को पता चली। इन टुलो को सोलहवीं से बीसवीं सदी के बीच बनाया गया था। 2008 में यूनेस्को ने इन्हें विश्व धरोहर का दर्जा दिया था। 
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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
जब चीन में आर्थिक सुधार शुरू किए, तो इन टुलो में रहने वाले बहुत से लोग शहरों में जाकर बस गए। ये शानदार इमारतें वीरान होने लगी थीं। मगर जैसे-जैसे तरक्की हुई और इनकी शोहरत दूर-दराज तक फैली, यहां सैलानियों का आना शुरू हुआ। 
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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
2008 मे जब यूनेस्को ने फुजियान के ऐसे 46 टुलो को विश्व विरासत का दर्जा दिया तो यहां टूरिज्म का विस्तार तेजी से हो गया। कभी खुद को बाहरी लोगों की नजरों से बचाने के लिए बनाए गए मिट्टी के इन किलों के दरवाजे बाहरी लोगों के लिए खुल गए। अंदर एक पूरी दुनिया आबाद देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। टूरिज्म बढ़ा तो इन्हें छोड़कर बाहर बसने गए लोग भी वापस आने लगे। ऐसे ही एक शख्स हैं, लिंग जोंग युआन। लिंग जोंग बीस बरस की उम्र में अपना कारोबार करने के लिए ग्वांगजो शहर में जाकर बस गए थे। मगर जब उन्हें टुलो की बढ़ती शोहरत का पता चला, तो वो वापस अपने टुलो चले आए। वो यहां पर गॉरमेट टी यानी खास तरह की चाय बेचने का कारोबार करते हैं। 
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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
लिंग जोंग कहते हैं कि शहर में उनके कारोबार की पहुंच सीमित थी, जबकि टुलो को देखने के लिए लोग पूरी दुनिया से आते हैं। इसलिए उन्होंने यहां आकर अपना कारोबार शुरू कर दिया। आज इन टुलो को देखने के लिए बड़ी तादाद में लोग आते हैं। इनके बीच लिंग जोंग का धंधा खूब फल-फूल रहा है। लिंग जोंग, घर वापसी करने वाले यहां के अकेले बाशिंदे नहीं हैं। वो तो कारोबार के लिए वापस आए हैं। मगर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो शहरों की जिंदगी से उकताकर इस किलाबंद बस्ती में रहने के लिए वापस आए हैं। 

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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
81 बरस के जियांग एन चिन ऐसे ही एक शख्स हैं। जियांग यहीं पैदा हुए थे। जवानी के दिनों में वो काम की तलाश में अपना टुलो छोड़कर चले गए थे। मगर, वो यहां रहने के लिए वापस आ गए हैं। जियांग कहते हैं कि शहरी जिंदगी में एकाकीपन बहुत था। यहां लोग एक-दूसरे से मिल-जुलकर रहते हैं। एक-दूसरे के साथ वक्त बिताते हैं। बहुत मिलनसार होते हैं। इसीलिए वो अपने टुलो में रहने के लिए वापस आ गए।

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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
जियांग, इलाके के सबसे बड़े टुलो में रहते हैं। इसका नाम छंग छी लोग है, जिसे तमाम टुलो का राजा कहा जाता है। इसमें एक साथ कई गांव आबाद हैं। ये बेहद शानदार इमारत है। जियांग का परिवार कई पीढ़ियों से यहां रहता आया है। घर वापसी के बाद जियांग यहां हंसी-खुशी से अपनी जिंदगी के आखिरी वक्त बिता रहे हैं। वे यहां अपने परिवार की चार पीढ़ियों के साथ रहते हैं। 
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टूलो गांव, चीन - फोटो : Social media
चीन के लोग मेहमाननवाजी के लिए भी मशहूर हैं। यहां परंपरा के मुताबिक पूरा परिवार एक साथ खाना खाता है। जियांग शहर में शायद यही जिंदगी मिस कर रहे थे। टुलो में वापसी से उन्हें अपनी खोई हुई जिंदगी वापस मिल गई है। इन टुलो में सैलानियों का बहुत आना-जाना रहता है। लेकिन यहां के बाशिंदे इससे परेशान नहीं होते। वो अपनी निजी जिंदगी में इस ताक-झांक को अच्छा मानते हैं, क्योंकि सैलानी आते हैं, तो उनका कारोबार बेहतर होता है। अगर सैलानियों का आना कम हो जाता है, तब यहां के लोगों को फिक्र हो जाती है। चीन के ये मिट्टी के किले, वाकई पूरब की सभ्यता के शानदार प्रतीक हैं। 
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