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ढाई करोड़ साल पुरानी वो झील, जहां नाव तक चलाना है नामुमकिन

Fri, 27 Dec 2019 10:49 AM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कराकुल झील - फोटो : Social media
मध्य एशियाई देशों में फैले पामीर के पठार को दुनिया की छत कहा जाता है। इन्हीं पहाड़ों के बीच, समुद्र तल से करीब 4 हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित है कराकुल झील। ये दक्षिण अमरीका की मशहूर टिटिकाका झील से भी ऊंचाई पर है। ये विशाल झील, करीब ढाई करोड़ साल पहले धरती से उल्कापिंड के टकराने की वजह से बनी थी। कराकुल झील 380 वर्ग किलोमीटर में फैली है। कई जगहों पर ये 230 मीटर तक गहरी है। बेहद खूबसूरत ये झील, चारों तरफ से बर्फीले पहाड़ों और ऊंचे रेगिस्तानी इलाकों से घिरी हुई है। आप पामीर हाइवे के जरिए कराकुल झील तक पहुंच सकते हैं।
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कराकुल झील - फोटो : Social media
ब्रितानी नक्शानवीसों ने इस झील का नाम महारानी विक्टोरिया के नाम पर रखा था। बाद में सोवियत संघ ने इसका नाम कराकुल यानी काली झील रख दिया। हकीकत ये है कि ये झील दिन में कई बार अपना रंग बदलती है। कभी इसका पानी नीला, तो कभी फिरोजी, कभी गहरे हरे रंग का तो शाम के वक्त गहरा काला दिखता है। 
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कराकुल झील - फोटो : Social media
जोखिम भरे सफर के शौकीन लोग दूर-दूर से इस झील को देखने आते हैं। कराकुल झील का सबसे करीबी कस्बा है ताजिकिस्तान का मुर्गब। सीमा पार किर्गिजिस्तान का ओस भी झील के पास ही पड़ता है। नमक ने इस झील की घेरेबंदी कर रखी है। इस झील से पानी निकलकर बाहर नहीं जाता। नतीजा ये कि कराकुल झील एशिया की सबसे खारी झील है। इस के पानी में इतना नमक है कि इस में एक खास तरह की मछली के सिवा कोई जीव नहीं पाया जाता। कराकुल झील में केवल स्टोन लोच नाम की मछली ही पायी जाती है, जो बलुआ तलछट वाली झीलों में आबाद हो सकती है।

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कराकुल झील - फोटो : Social media
भले ही कराकुल में जीव न पाए जाते हों, लेकिन, इसके बीच में निकल आए द्वीपों और आस-पास के दलदली किनारों पर दूर-दूर से परिंद आते हैं। इनमें हिमालय पर्वत पर रहने वाले बाज और तिब्बती तीतर शामिल हैं। कराकुल झील इतनी खारी है कि इसमें नाव चलाना कमोबेश नामुमकिन है। अगर आप फिर भी इसमें नाव खेने की कोशिश करते हैं, तो उसके उलट जाने की पूरी आशंका होती है। जिस तरह मध्य-पूर्व में मृत सागर या डेड सी है, उसी तरह की है कराकुल झील। मृत सागर के पानी में भी इतना नमक है कि वहां कोई जीव नहीं पल सकता। यही हाल कराकुल का भी है। फिर भी इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। आस-पास के लोग यहां गर्मियों में जुटते हैं। त्यौहार सा समां हो जाता है। पतंगे उड़ाने से लेकर राफ्टिंग तक की प्रतियोगिताएं होती हैं। 
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कराकुल झील के पास स्थित गांव - फोटो : Social media
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान झील के पास, जर्मन कैदियों को रखा जाता था। बाद में किर्गीजिस्तान के घुमंतू कबीले, गर्मियों में झील के आस-पास के चरागाहों में भेड़-बकरियां चराने आने लगे। हालांकि अब झील के पास एक छोटा सा गांव ही आबाद है। इसका नाम भी कराकुल ही है। ये झील के पूर्वी हिस्से के पास स्थित है। झील देखने आने वालों के लिए किर्गीजिस्तान के लोगों ने कुछ झोपड़ियां भी बना ली हैं। सुबह के वक्त अगर आप कराकुल गांव के आस-पास से गुजरें, तो सफेदी की हुई दीवारों वाले नीले घर आप को पुराने दौर के किसी यूनानी द्वीप की याद दिलाते हैं। पर, यहां इतने कम लोग रहते हैं कि ये कस्बा भुतहा लगता है। गर्मियों में यहां चमड़ी जला देने वाली धूप होती है, तो सर्दियों में हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ती है। दोनों ही मौसमों में लोगों का घर से निकलना मुश्किल होता है। झील का पानी भयंकर खारा होने के बावजूद इस गांव में गर्मियों में बड़ी तादाद में मच्छर हो जाते हैं। 
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कराकुल गांव - फोटो : Social media
कराकुल की वीरान गलियों से गुजरते हुए आप को अहसास होता है कि कभी ये मशहूर कारोबारी रास्ते सिल्क रूट का हिस्सा हुआ करता था। बेहद पठारी इलाके में ऐसी ही छोटी-छोटी बस्तियां आबाद थीं। चीन के काशगर से उज्बेकिस्तान के बुखारा और समरकंद के बीच में ऐसे ही ठिकानों पर मुसाफिरों के कारवां रुका करते थे। गांव में एक पुरानी सफेदी की हुई मस्जिद है जो खामोश सी मालूम होती है। मिट्टी और ईंटों के बने मकान लोगों को पनाह देने के काम आते हैं। ये बड़ा डरावना सा गांव महसूस होता है। दूर-दूर तक फैले पहाड़ और खुले आसमान तले जब आप अकेले खड़े होते हैं, और दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता, तो सिहरन उठती है।
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कराकुल झील के आसपास का इलाका - फोटो : Social media
झील की घेरेबंदी किए से मालूम होने वाले पहाड़ों का सिलसिला जहां तक नजर जाए, वहां तक दिखाई देता है। उमस भरी हवा भी यहां नहीं पहुंच पाती। पूरे साल भर में यहां 30 मिलीमीटर से भी कम बारिश होती है। ये मध्य एशिया का सबसे सूखा इलाका है। यहां गिनती के ही लोग रहते हैं। पहुंचना भी मुश्किल है। फिर भी कराकुल झील जोखिम भरे सफर के दीवानों को अपनी तरफ खींचती है। यहां तक पहुंचने का एक बार का सफर बरसों तक याद रखने वाला तज़ुर्बा होता है।
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