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खुद को ही देखकर आकर्षित हो जाती है, जानिए 'ऑटोसेक्शुअल' लड़की की कहानी

Wed, 12 Jun 2019 08:20 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay.com
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'ये सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि मैं हमेशा खुद को देखकर ही आकर्षित होती हूं। बाकी टीनेजर्स की तरह मुझे भी अपने व्यक्तित्व और लुक की चिंता रहती है। जब भी मैं नहा कर आती हूं, कपड़े पहनती हूं या फिर सेक्शुअल अट्रैक्शन की खोज में होती हूं तो खुद को आईने में देखती हूं। 

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हो सकता है मेरा शरीर आकर्षित करने वाला न हो। मैं पतली हूं, मेरी ठोडी बहुत लंबी है, मेरे बाल घुंघराले हैं, लेकिन बिना कपड़े के मेरा शरीर मुझे वाकई आकर्षित करता है। मुझे अपनी सेक्शुअलिटी के बारे में सोच कर कभी अजीब नहीं लगता था, लेकिन 17 साल की उम्र में जब मैंने अपने दोस्तों को इस बारे में बताया तो इस बारे में मेरी सोच बदल गई। 

हम सब साथ में बड़े हुए थे अब भी एक-दूसरे के काफी करीब हैं। हम अक्सर अपनी सेक्शुलिटी के अनुभवों को लेकर बातें किया करते थे, लेकिन जब मैंने उनको अपने सेक्शुअल अनुभवों के बारे में बताया तो किसी ने समझा ही नहीं बल्कि उन लोगों को ये हास्यास्पद लगा। वो इस बात को लेकर मेरा मजाक बनाते रहे। 

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मैं भी उनके चुटकुलों पर उनके साथ हंसती थी। पर भीतर ही भीतर मैं सोचती थी कि मेरे साथ क्या गलत है। तब मुझे पता चला कि मैं खुद से कुछ इस तरह सेक्शुअली आकर्षित हूं जैसे आम लोग नहीं होते हैं, लेकिन अब मुझे इस तरह महसूस करने की आदत हो गई है। हाल ही में मुझे पता चला है कि जैसा मैं खुद को लेकर महसूस करती हूं, उसके लिए एक शब्द भी है जो विज्ञान में इस्तेमाल किया जाता है-'ऑटोसेक्शुअल'। अब मैं खुद को गर्व से 'ऑटोसेक्शुअल' बताती हूं। 

क्या है ऑटोसेक्शुअलिटी?

वो लोग जो अपने शरीर को देखकर ही खुद को यौन सुख दे पाते हैं और अपने शरीर को देखकर ही आकर्षित होते हैं, उन्हें विज्ञान 'ऑटोसेक्शुअल' कहता है। ऐसे लोग न तो गे होते हैं और न ही लेज्बियन बल्कि इनके लिए 'ऑटोसेक्शुअल' टर्म का इस्तेमाल किया जाता है। इन लोगों को किसी भी जेंडर के व्यक्ति से यौन आकर्षण नहीं होता है। 

ऑटोसेक्शुअल एक ऐसा शब्द है जिसे परिभाषित करने के लिए वैज्ञानिकों को काफी मेहनत करनी पड़ी। इस शब्द को ठीक से परिभाषित करने के लिए न तो ज्यादा डेटा है और न ही ज्यादा रिसर्च। साल 1989 में इस शब्द का जिक्र पहली बार सेक्स चिकित्सक बर्नाड एपेलबाउम ने एक पेपर में किया था। उन्होंने इस शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया था जो किसी दूसरे व्यक्ति की सेक्शुअलिटी से आकर्षित नहीं हो पाते हैं। लेकिन आज इस शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है जो विशेष रूप से अपने ही शरीर से सेक्शुअली आकर्षित होते हैं। 

माइकल आरोन, 'मॉडर्न सेक्शुअलिटी: द ट्रुथ अबाउट सेक्स एंड रिलेशनशिप' के लेखक हैं। वो बताते हैं कि अपने आपको देख कर आकर्षित होना काफी आम है, लेकिन कुछ लोग दूसरों की तुलना में खुद को देखकर या छूकर अधिक उत्तेजित महसूस करते हैं। ऐसे ही लोग 'ऑटोसेक्शुअल' कहलाते हैं। 

बहुत से लोगों ने मुझे 'नार्सिस्ट' कहा। यानी वो व्यक्ति जो खुद से बहुत प्यार करते हों और अपने आप पर ही मुग्ध होते रहते हैं। लेकिन लंदन यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले डॉ जेनिफर मैकगोवन का कहना है कि 'नार्सिसिस्टिक पर्सनालिटी डिसऑर्डर' के मरीज में सहानुभूति की कमी, प्रशंसा की जरूरत या स्वयं को लेकर ज्यादा भावनाएं जैसे लक्षण होते हैं, ऑटोसेक्शुअलिटी एक अलग चीज है। 

डॉक्टर जेनिफर बताते हैं, 'ऑटोसेक्शुअल्स अपने साथ सेक्शुअली ज्यादा अच्छा महसूस करते हैं जबकि नार्सिस्ट लोगों को दूसरे लोगों के अटेंशन की चाह होती है। इसके अलावा ऑटोसेक्शुअलिटी का सहानुभूति या प्रशंसा की कमी से भी कोई लेना-देना नहीं है।'

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि दूसरे लोगों की तरह ऑटोसेक्शुअल लोगों में भी सेक्शुअलिटी के अलग-अलग स्तर देखने को मिलते हैं। कुछ लोग ऑटोसेक्शुअल होने के साथ-साथ ऑटोरोमेंटिक भी होते हैं, जो खुद के साथ ही डेट पर या अच्छे मौसम में एक वॉक के लिए जाते हैं।

ऑटोसेक्शुअल होने के साथ-साथ मुझे कभी-कभी आम व्यक्ति जैसा होने की इच्छा होती है। बहुत गुस्सा आता है जब आपके दोस्त नहीं समझ पाते कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं।
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जब मैं अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ होती हूं तो मुझे लगता है कि मैं अलग तरह से महसूस कर रही हूं। मैं सेक्शुअली वो सब महसूस नहीं कर पाती, जो मेरा ब्वॉयफ्रेंड करता है। ऐसे में मेरी भी इच्छा होती है कि काश मैं भी आम लोगों की तरह महसूस कर पाती, लेकिन फिर मैं सोचती हूं कि सेक्शुअलिटी में कुछ भी आम तो है ही नहीं, हम सब अलग हैं। 

हाल ही में मैं ऑनलाइन एक फीमेल ऑटोसेक्शुअल से मिली हूं जिसे मैंने अपने ऑटोसेक्शुअल होने के बारे में भी बताया। उससे बात करके मुझे बहुत अच्छा लगा। हम कुछ ऐसे लोगों के समुदाय में हैं जो इस बात की खोज कर रहे हैं कि हम सेक्शुअलिटी के ढांचे में कहां खड़े होते हैं।

ऐसे बहुत-से लोग हैं जो इस बात को नहीं समझेंगे। जज करना या बातें बनाना बहुत आसान है लेकिन आप कभी नहीं समझ पाएंगे कि एक ऑटोसेक्शुअल कैसा महसूस करता है। मैं कई लोगों के साथ रिश्ते में रही हूं लेकिन जैसा मैं अपने साथ महसूस करती हूं वैसा किसी के साथ नहीं कर पाती हूं। 
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