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बांग्लादेश के राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या की हैरान करने वाली कहानी

Wed, 03 Jun 2020 01:35 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति जनरल जियाउर रहमान - फोटो : Social media
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25 मई 1981 को बांग्लादेश के राष्ट्रपति जनरल जियाउर रहमान ने अपने सैनिक सचिव से कहा कि वो 29 मई को चटगांव की यात्रा पर जाएंगे। इस फैसले से सुरक्षा एजेंसियों की चिंता थोड़ी बढ़ गई, क्योंकि जिस दिन जिया ने चटगांव जाने का फैसला किया, उसी दिन उन्होंने चटगांव के जीओसी मेजर जनरल मोहम्मद अबुल मंजूर के ढाका तबादले के आदेश पर भी दस्तखत किए।

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जनरल मंजूर को ये तबादला पसंद नहीं आया। हालांकि उन्हें इस पद पर रहते साढ़े तीन साल हो चुके थे। उनके जख्मों पर नमक छिड़कते हुए जनरल जिया ने उन्हें ये भी कहलवा भेजा था कि 29 मई को जब वो पटेंगा हवाई अड्डे पर पहुंचें तो उन्हें वहां मौजूद रहने की जरूरत नहीं है। इसके लिए बहाना ये बनाया गया था कि राष्ट्रपति एक राजनीतिक यात्रा पर जा रहे हैं, इसलिए जीओसी का हवाईअड्डे पर रहना जरूरी नहीं है। 

मंजूर ने जनरल जिया के इस निर्देश को अपनी निजी बेइज्जती के तौर पर लिया। इसके पीछे कुछ कारण भी थे। एक तो बांग्लादेश के नौसेनाध्यक्ष रियर एडमिरल एमए खां जनरल जिया के विमान में ही आ रहे थे। दूसरे एयर वाइस मार्शल सदरुद्दीन मोहम्मद होसैन पाटेंगा हवाईअड्डे पर जनरल जिया का स्वागत करने वाले थे। 
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जनरल मंजूर और उनके मातहत अफसरों ने कई बार जनरल जिया के सैनिक सचिव को ढाका फोन कर पूछा भी कि उन्हें हवाईअड्डे की स्वागत समिति से क्यों अलग रखा जा रहा है जबकि वो उस इलाके के सेना के सबसे बड़े अफसर हैं। आखिर में जिया के सैनिक सचिव मेजर जनरल सदीक़ुर रहमान चौधरी को झल्ला कर जनरल मंजूर को कहना पड़ा, आप समझते क्यों नहीं? अगर जिया आपको वहां नहीं चाहते तो आप वहां जाने की जिद क्यों कर रहे हैं?' 

खुफिया विभाग की अनदेखी

फोरसेज इंटेलिजेंस के महानिदेशक मेजर जनरल महब्बत जान चौधरी ने बार-बार जनरल जिया को सलाह दी थी कि आप एक जून तक अपनी चटगांव यात्रा स्थगित कर दें। इसी दिन जनरल मंजूर को अपनी नई पोस्टिंग पर ढाका रिपोर्ट करने के आदेश दिए गए थे। यही नहीं जब जिया चटगांव के लिए रवाना हो रहे थे तो चौधरी ने उनसे अनुरोध किया था कि वो चटगांव में रात न बिताएं और उसी शाम ढाका वापस लौट आएं, लेकिन जिया ने उनकी ये बात भी नहीं मानी। 

जब मंजूर के खासमखास लेफ्टिनेंट कर्नल मोतीउर रहमान 25 मई को एक इंटरव्यू के सिलसिले में ढाका गए तो उनके पुराने दोस्त लेफ्टिनेंट कर्नल महफूज़ुर रहमान ने (जो उस समय जनरल जिया के पर्सनल स्टाफ ऑफिसर थे) उन्हें मेजर जनरल मंजूर के तबादले के बारे में बताया। मोती इस खबर से बहुत नाराज हुए और जब उन्हें बताया गया कि जिया 29 मई को चटगांव जा रहे हैं, तभी जनरल जिया की हत्या का प्रयास करने की योजना बननी शुरू हुई।  

इस धरती पर जनरल जिया के आखिरी दिन की शुरुआत साधारण रही। सुबह नौ बजे उन्होंने बांग्लादेश विमान की विशेष उड़ान से चटगांव के लिए उड़ान भरी। चटगांव के सर्किट हाउस पहुंचने पर उन्हें हल्का नाश्ता दिया गया। इससे पहले कि वो चाय पीते और बिस्किट खाते, उनके निजी चिकित्सक लेफ्टिनेंट कर्नल महताबुल इस्लाम ने उन्हें चखा। राष्ट्रपति के डॉक्टर उनके फूड टेस्टर की भूमिका भी निभा रहे थे। 

जनरल जिया के उस दिन का वर्णन करते हुए मशहूर पत्रकार एन्टनी मेसक्रेनहस अपनी किताब 'बांगलादेश अ लेगेसी ऑफ ब्लड' में लिखते हैं, 'हल्के नाश्ते के बाद सर्किट हाउस की पहली मंजिल के बरामदे में जिया ने अपने पार्टी के लोगों के साथ दो घंटे तक बैठक की। इसके बाद साढ़े बारह बजे जुमे की नमाज के लिए बैठक को विराम दिया गया। सफेद कुर्ता-पायजामा पहने हुए जनरल जिया जब चाक बाजार की चंदनपुरा मस्जिद गए तो वहां मौजूद लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।' 

'नमाज के बाद वो अपने पार्टी सहयोगियों के साथ दिन का खाना खाने सर्किट हाउस लौटे। जिया को तेल और मसाले वाली करी बिल्कुल पसंद नहीं थी, इसलिए उनके लिए हल्का खाना बनवाया गया और सर्किट हाउस के बरामदे में ही परोसा गया। इसके बाद उन्होंने डेढ़ घंटे तक आराम किया। शाम पांच बजे उन्हें चाय के लिए जगाया गया। इसके बाद उन्होंने ग्राउंड फ्लोर पर कान्फ्रेंस रूम में शहर के सभ्रांत लोगों की एक सभा को संबोधित किया।'

'रात नौ से 11 बजे के बीच उन्होंने अपनी पार्टी के नौ सदस्यों से बात की। इस बीच कुछ मिनटों के लिए चटगांव के कमिश्नर सैफ़ुद्दीन अहमद और पुलिस कमिश्नर एबीएम बोएदुज्जमां भी उनसे मिलने आए। 11 बजे के आसपास उन्होंने रात का खाना खाया। उनके खाने से पहले उनके डॉक्टर ने एक बार फिर उनके खाने का परीक्षण किया। आधी रात को उन्होंने ढाका फोन कर अपनी पत्नी खालिदा जिया से 15 मिनट तक बात की। ये उनकी आखिरी बातचीत थी। जब करीब साढ़े बारह बजे जिया ने अपने कमरे की लाइट बुझाई तो चटगांव के आसमान में एक जबरदस्त तूफान ने दस्तक दी और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।'  

हत्यारों की बैठक

उन्होंने अपने स्टाफ को सुबह बेड टी के लिए छह बजकर 45 मिनट पर जगाने के लिए कहा। तय हुआ कि अगर तूफान तब तक ठहर जाएगा तो वो एक घंटे बाद ढाका के लिए रवाना हो जाएंगे। उसी समय शहर के बाहर केंटोन्मेंट में उनके हत्यारे उनको मारने की तैयारी कर रहे थे। हर शख्स को अलग-अलग भूमिकाएं दी गई थीं। 

112 सिग्नल के मेजर मारूफ रशीद की जिम्मेदारी थी कि वो सुबह तड़के ही ढाका से सभी संचार लिंक तोड़ लें। जनरल जियाउर रहमान की हत्या के बाद जारी किए गए श्वेत पत्र में कहा गया है कि 'कर्नल मोती ने उस रात राष्ट्रपति के प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर और अपने पुराने दोस्त लेफ्टिनेंट कर्नल महफूज़ुर रहमान से टेलिफोन पर बात कर उन्हें बता दिया कि उस रात जनरल जिया को रास्ते से हटाने की कोशिश की जाएगी और कर्नल महफूज़ुर ने जिया के कमरे के बाहर तैनात दो सशस्त्र पुलिस गार्ड्स को ड्यूटी से हटा लिया था।' 

कुरान पर हलफ

रात साढ़े 11 बजे कर्नल मोती ने 11 और 28 ईस्ट बंगाल के सभी अफसरों की 28 ईस्ट बंगाल के दफ्तर में बैठक बुलाई। इस बैठक में मेजर मोमिन, मेजर गियासुद्दीन अहमद, कैप्टन मुनीर, कैप्टेन जमील हक, कैप्टन मोइनुल इस्लाम और कैप्टन गयासुद्दीन अहमद समेत कुल छह अफसर शामिल हुए। कर्नल मोती ने अंदर से कमरा बंद किया और कुरान शरीफ ले आए।

कमरे में मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, 'साथियों, हम जो कुछ भी कर रहे रहे हैं अपने देश और उसके लोगों के हित और न्याय के लिए कर रहे हैं। अगर आप हमारे साथ हैं तो कुरान पाक पर हाथ रख कर कहें कि जो जरूरी है वो करेंगे। अगर आप में से कोई ऐसा नहीं करना चाहता तो वो इस कमरे से बाहर जा सकता है, लेकिन मेरा एक ही अनुरोध है कि वो इसके बारे में किसी को कुछ बताएं नहीं।' किसी ने भी असहमति नहीं व्यक्त की। सबने बारी-बारी से कुरान छूकर हलफ उठाया। इसके बाद सबने सैनिक वर्दी पहनी और एक-एक सब मशीन गन उठा ली। 

तीन दलों का गठन

जब इन अफसरों का दल कलूरघाट पहुंचा तो मूसलाधार बारिश हो रही थी। वहां सबसे पहले पहुंचने वाले थे लेफ्टिनेट कर्नल महबूब जो अपने तीन साथियों के साथ अपनी सफेद टोयोटा कार में वहां पहुंचे थे। एक घंटे के अंदर 18 अफसर और दो जेसीओ भी वहां पहुंच गए। लेफ्टिनेंट कर्नल मोती इन सबका नेतृत्व कर रहे थे। इन सबके पास 11 सब मशीन गन, तीन हैंड रॉकेट लॉन्चर्स और तीन ग्रेनेड फायरिंग राइफल्स थीं। ये सब पूरी तरह से लोडेड थीं और एक्शन के लिए तैयार थीं। 

इस हमले के लिए तीन दल बनाए गए। पहले दो दलों की जिम्मेदारी थी सर्किट हाउस के अंदर जाना। तीसरे दल को सर्किट हाउस के पीछे अल्मास सिनेमा के पास तैनात किया गया। उनकी ब्रीफ ये थी कि कोई भी सर्किट हाउस से बाहर भागने की कोशिश करे तो उसे तुरंत गोली से उड़ा दिया जाए। 

जिया पर हमला करने के लिए मोती ने छह लोगों को चुना, महबूब, लेफ्टिनेंट कर्नल फज्ले होसैन, खालिद और कैप्टेन जमील हक, कैप्टेन मोहम्मद अब्दुस सत्तार और लेफ्टिनेंट रफीकुल हसन खां। कमरा नंबर नौ पर जहां जनरल जियाउर रहमान के रहने का अनुमान था, हमला करने की जिम्मेदारी फज्ले होसैन और कैप्टेन सत्तार को दी गई। दूसरे दल में मोती के साथ मेजर काजी मोमीनुल हक, मोजफ्फर होसैन, कैप्टन इलियास और सलाहउद्दीन अहमद और लेफ्टिनेंट मोसलेहुद्दीन थे। ये बैकअप टीम थी और इनका रोल बाहर से किसी हस्तक्षेप को रोकना था। 

हैंड रॉकेट लॉन्चर से हमले की शुरुआत

ये तीनों दल सुबह साढ़े तीन बजे कलूरघाट से धीमी गति से ड्राइव करते हुए मूसलाधार बारिश के बीच सर्किट हाउस की तरफ रवाना हुए। बाद में प्रकाशित व्हाइट पेपर के अनुसार 'सबसे आगे चल रही जीप में सवार लेफ्टिनेंट रफीकुल हसन खां ने लेफ्टिनेंट कर्नल फज्ले से पूछा, 'क्या आप राष्ट्रपति को मारने जा रहे हैं?' लेफ्टिनेंट कर्नल फज्ले बोले, 'नहीं, हम उन्हें सिर्फ पकड़ेंगे।' 

दोनों हमलावर टीमें बिना किसी विरोध के सर्किट हाउस में दाखिल हुईं। उस भवन के मुख्य गेट को जान-बूझकर खुला रख छोड़ा गया था। वहां पर तैनात चार संतरियों ने हमलावरों को बिना किसी बाधा के अंदर आने दिया। जब वो सर्किट हाउस के सामने पहुंचे, लेफ्टिनेंट कर्नल फज्ले होसैन ने एक के बाद एक दो हैंड रॉकेट लॉन्चर फायर किए। 

इससे जिया के कमरे के नीचे वाले कमरे की दीवार में बड़ा छेद हो गया। इस फायरिंग का उद्देश्य सर्किट हाउस में रह रहे लोगों को डराना और अपने दल के लोगों को सिग्नल देना था कि ऑपरेशन शुरू हो चुका है। इसके बाद ग्रेनेड, रॉकेट्स और मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी गई। सबसे पहले मरने वाले थे पोर्टिको पर संतरी की ड्यूटी कर रहे पुलिस कॉन्सटेबिल दुलाल मियां। उनके सिर पर गोली लगी। इसके बाद वहां गार्ड ड्यूटी पर तैनात सशस्त्र पुलिस जवानों ने कोई विरोध नहीं किया। कुछ लोग तो भाग गए और जिसे जगह मिली वो वहीं छिप गया। इस हत्याकांड की जांच कर रहे आयोग ने पाया कि दुलाल मियां के अलावा सिर्फ तीन पुलिसकर्मी गोलियों से घायल हुए। 

प्रेसिडेंट गार्ड के जवान नदारद

यहां तक कि सर्किट हाउस में तैनात प्रेसिडेंट गार्ड रेजिमेंट के सैनिक भी कुछ नहीं कर पाए। दो लोग जिन्हें राष्ट्रपति के शयनकक्ष के सामने खड़े होना चाहिए था, नीचे पाए गए। सिविल जांच कमीशन की जांच में पाया गया कि एक दूसरे दल को सुबह चार बजे इन लोगों की जगह लेनी थी, लेकिन ये लोग उनके आने से पहले ही नीचे चले गए थे। 

जब फायरिंग शुरू हुई तो जिया की रक्षा में तैनात कुछ सैनिकों ने उनके कमरे की तरफ जाने की कोशिश की, लेकिन वो बहुत आगे नहीं जा सके। हमले के शुरुआती मिनटों में ही उनमें से चार लोग ग्राउंड फ्लोर पर ही मार दिए गए और दो बुरी तरह से घायल हो गए। पहली मंजिल पर जनरल जिया के बेडरूम की सुरक्षा के लिए एक भी सुरक्षाकर्मी मौजूद नहीं था।  

दो हमलावर अपने ही साथियों की गोलियों से घायल

इस पूरे ऑपरेशन में हमलावरों में से कोई भी सर्किट हाउस के सुरक्षा गार्ड की गोली से न तो मारा गया और न ही घायल हुआ। जो दो लोग घायल हुए वो अपने ही साथियों की गोली के शिकार हुए। बैकअप टीम द्वारा फायर की गई गोलियों से लेफ्टिनेंट कर्नल फज्ले होसैन बुरी तरह से घायल हो गए। इसी तरह कैप्टन जमील हक को भी अपने साथियों की ही गोली लगी। घायल होने के बावजूद जमील पहली मंजिल के बरामदे तक पहुंचने में सफल हो गए, जहां उन्होंने राष्ट्रपति के निजी अंगरक्षक नायक रफीकुद्दीन को गोली मारकर घायल किया।

राष्ट्रपति के मुख्य सुरक्षा अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल मोएनुल अहसन और प्रेसिडेंट गार्ड रेजिमेंट के कैप्टेन अशरफुल खां पहली मंजिल के पीछे वाले कमरों में सो रहे थे और विस्फोट की आवाज सुनकर जागे। वो अपनी गन लेकर राष्ट्रपति की रक्षा के लिए दौड़े, लेकिन इससे पहले कि वो अपनी गनों का इस्तेमाल कर पाते, उन्हें हमलावरों ने कॉरीडोर में ही धराशाई कर दिया। 

कमरा नंबर चार में थे जनरल जिया

एंटनी मेसक्रेन्हस अपनी किताब 'बांग्लादेश - अ लेगेसी ऑफ ब्लड' में लिखते हैं, 'जब तक कर्नल मोती सहित बैकअप टीम भी राष्ट्रपति जिया की तलाश में पहली मंजिल पर पहुंच चुकी थी। उनके पास खबर थी कि राष्ट्रपति कमरा नंबर नौ में ठहरे हुए हैं। जब कैप्टन अब्दुस सत्तार ने उस कमरे के दरवाजे पर ठोकर मारी तो उन्होंने वहां बीएनपी की नेता डॉक्टर अमीना रहमान को पाया। इसके बाद हमलावर हर दरवाजे को खोलकर देखने लगे। कैप्टन सलाहउद्दीन को जोर-जोर से पूछते सुना गया, 'राष्ट्रपति कहां हैं? राष्ट्रपति कहां हैं? 

उन्हें जल्दी ही पता चल गया कि जिया कमरा नंबर चार में सो रहे हैं। ये कमरा सीढ़ियों के बिल्कुल पास था और इसके दो दरवाजे थे। एक सीढ़ियों के सामने खुलता था और दूसरा बरामदे में खुलता था। ये दरवाजा बाहर से बंद था। बाद में लेफ्टिनेंट रफीकुल हसन खां ने जांच आयोग के सामने गवाही में कहा, 'अचानक शोर हुआ राष्ट्रपति बाहर आ रहे हैं। कुछ देर बाद किसी ने चिल्लाकर कहा, 'ये हैं वो'। सफेद पायजामा पहने जिया नींद से उठ कर आए थे, इसलिए उनके बाल अस्त-व्यस्त थे। उन्होंने हाथ उठाकर बहुत निर्भीकता से कहा, 'तोमारा की चाव' (तुम क्या चाहते हो?)' 

सब मशीन गन जिया पर खाली की

बाद में लेफ्टिनेंट मुस्लेहुद्दीन ने गवाही देते हुए कहा, 'जिया के सबसे नजदीक था मैं और मेजर मुजफ्फर जो कांप रहे थे। मैंने जिया को आश्वस्त करना चाहा, 'परेशान मत होइए। डरने की कोई बात नहीं है सर।' हम दोनों को अब तक यही आभास था कि जिया को गिरफ्तार किया जाना है, उन्हें मारना नहीं है, लेकिन कर्नल मोती के लिए जो पास खड़े थे, कोई दया नहीं थी।' 

'उन्होंने उन्हें कोई मौका नहीं दिया। उन्होंने अपनी सब मशीन गन से फायर किया, जिसकी गोलियां जिया के शरीर के दाहिने हिस्से में लगीं। जिया मुंह के बल गिरे। उनके सारे शरीर से खून निकल रहा था। मोती ने अपनी मशीनगन के बैरल से जिया के शरीर को पलटा और पूरी मैगजीन जिया के चेहरे और शरीर के ऊपरी हिस्से पर खाली कर दी।' जिया के मरते ही सारे हत्यारे सर्किट हाउस से चले गए। वो अपने साथ अपने दो घायल साथियों को ले गए। इस पूरे प्रकरण में सिर्फ 20 मिनट लगे।  

आंख, सीने और पेट में गोलियां

लेफ्टिनेंट मुस्लेहुद्दीन ने अपनी गवाही में आगे बताया, 'केंटोन्मेंट लौटते हुए मेजर मुजफ्फर ने जो अभी तक कांप रहे थे, मुझसे कहा मुझे नहीं पता था कि हम राष्ट्रपति को मारने जा रहे हैं। मैं सोच रहा था कि हमें उन्हें गिरफ्तार करना है।' 

जिया के निजी चिकित्सक लेफ्टिनेंट कर्नल महताबुल इस्लाम ने अपनी गवाही में कहा, 'फायरिंग रुकने के बाद मैं अपने कमरे से बाहर निकला। मैंने देखा कि दरवाजे के बाहर गोलियों से छलनी राष्ट्रपति का शव पड़ा हुआ है। उनकी एक आंख पूरी तरह से नष्ट हो गई थी और उनके गले में गहरा घाव था। उनके सीने, पेट और पैरों में बहुत सारी गोलियों के निशान थे। उनके शरीर के चारों तरफ खून ही खून फैला हुआ था। उनका चश्मा सीढ़ियों पर पड़ा हुआ था।' 

एडीसी की भूमिका पर सवाल

सिविल जांच आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि 'जिया के स्टाफ ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल महफूज़ुर और उनके एडीसी कैप्टन मजहर तब तक अपनी पहली मंजिल के कमरों से बाहर नहीं निकले जब तक वायरलेस ऑपरेटर नायक अब्दुल बशर ने उनके दरवाजे खटखटा कर उन्हें पुकारा नहीं। जब तक हमलावरों को गए हुए काफी समय हो चुका था।' 

जिया की मौत के बाद जारी श्वेत पत्र में कहा गया, 'जिया के एडीसी कैप्टन मजहर जिया के बगल वाले कमरे में थे। उन्होंने राष्ट्रपति तक पहुंचने की खुद कोई कोशिश नहीं की। अलबत्ता उन्होंने उनसे फोन पर संपर्क साधने की कोशिश की, जिसमें उनको कामयाबी नहीं मिली।' 

उनके काम पर टिप्पणी करते हुए सिविल जांच आयोग ने कहा, 'राष्ट्रपति और उनके एडीसी के कमरों को जोड़ता हुआ एक दरवाजा था। उनके लिए राष्ट्रपति के पास पहुंचना बहुत आसान था। जब हमलावर राष्ट्रपति के कमरे के दरवाजे को पीट रहे थे, वो एडीसी के कमरे में जा कर बच सकते थे। एडीसी से उम्मीद की जाती थी कि खतरा देखते ही उन्हें उस दरवाजे से राष्ट्रपति को अपने कमरे में आने के लिए कहना चाहिए था। हमें ये जानकर ताज्जुब हुआ कि एडीसी ने कहा कि उन्हें पता ही नहीं था कि उनके और राष्ट्रपति के कमरे के बीच एक कनेक्टिंग दरवाजा था।' 
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जमीन पर पड़ा रहा जनरल जिया का शव

राष्ट्रपति जिया का शव बहुत देर तक उसी स्थान पर पड़ा रहा, जहां उन्हें मारा गया था। सर्किट हाउस पहुंचे हुए बीएनपी के नेताओं, चटगांव के कमिश्नर, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और नौसेनाध्यक्ष किसी ने ये भी मुनासिब नहीं समझा कि जनरल जिया के शव को जमीन से उठा कर पलंग पर लिटा दिया जाए। सिर्फ एक बीएनपी नेता मिजानुर रहमान चौधरी अपने खुद के बिस्तर से सफेद चादर उठा कर लाए और उन्होंने उसे मृत राष्ट्रपति के पार्थिव शरीर के ऊपर डाल दिया। 

नौसेनाध्यक्ष एडमिरल महमूद आलम खां, जो जिया के विमान में ही ढाका से चटगांव आए थे, साढ़े पांच बजे सर्किट हाउस पहुंचे। उन्होंने पोर्च में ही कुछ अधिकारियों से बात की। कुछ लोगों के जोर दिए जाने के बावजूद वो जिया के शव को देखने पहली मंजिल पर नहीं गए। 

साढ़े सात बजे तक सभी बीएनपी नेता और वरिष्ठ अधिकारी सर्किट हाउस से जा चुके थे। जिया के शव की निगरानी के लिए सिर्फ दो जूनियर अधिकारियों को वहां छोड़ा गया था और उनका पार्थिव शरीर अब भी जमीन पर ही पड़ा हुआ था। चटगांव के कमिश्नर सैफुद्दीन अहमद ने एंटनी मैसक्रेनहस को बाद में दिए गए इंटरव्यू में बताया, 'उसके बाद मैं लेफ्टिनेंट कर्नल महफूजुर और मेहताब और एडीसी कैप्टेन मशहूरुल हक को अपने घर नाश्ता कराने ले गया और मेरी पत्नी ने उन सब के लिए नाश्ता तैयार किया।'  

जिया को दफनाया गया

एक घंटे बाद तीन विद्रोही मेजर मुजफ्फर शौकत आले और रेजा करीब एक दर्जन सिपाहियों के साथ दो जीपों और एक सेना वैन के काफिले में सर्किट हाउस पहुंचे। उन्होंने राष्ट्रपति के शयनकक्ष की तलाशी ली। उन्हें जनरल जिया की निजी डायरी की तलाश थी, जिसमें वो अपने विचार लिखा करते थे। इन लोगों ने जिया के सामान को एक पुराने सूटकेस में भरा। उन्होंने जिया के पार्थिव शरीर को एक सफेद कपड़े में लपेटा। दो मारे गए सुरक्षा अधिकारियों लेफ्टिनेंट कर्नल अहसन और कैप्टेन हफीज के शवों को भी सफेद कपड़ों में लपेटा गया। साढ़े नौ बजे एक वैन में तीनों शवों को लादकर दफनाने के लिए ले जाया गया।  
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