पॉल अपनी जिंदगी पर एक किताब भी लिख चुके हैं
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3 दिन बाद आया होश
वहीं, पॉल को 3 दिन बाद होश आया और उन्होंने देखा की वो एक लोहे की मशीन में हैं, जिसे मेडिकल भाषा में आयरन लंग्स मशीन कहते हैं।
क्या है ये मशीन?
बात अब इस आयरन लंग्स मशीन की कर लेते हैं। आम भाषा में कहें तो लगवाग्रस्त मरीजों के लिए ये मशीन किसी वरदान से कम नहीं है, लेकिन इसमें रहना ही अपने आप में बड़ी बात है जो हर मरीज नहीं कर पाता है। ये मशीन मरीज के फेफड़ों में ऑक्सीजन भरने का काम करती है, जिससे वो जिंदा रह पाता है।
अब वकील हैं पॉल
कहते हैं अगर काम के लिए आपका जुनून है, तो फिर उस काम का होना तय है। ऐसा ही कुछ पॉल के साथ हुआ। दरअसल, पॉल कुछ करना चाहते थे इसलिए उन्होंने विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की सोची, लेकिन उनके दाखिले को बार-बार रिजेक्ट कर दिया जाता था। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पहले डलास में दक्षिणी मेथोडिस्ट विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और फिर ऑस्टिन में टेक्सास विश्वविद्यालय में लॉ स्कूल में प्रवेश ले लिया। यही नहीं, उन्होंने पॉल डलास और फोर्ट वर्थ में एक वकील के तौर पर काम भी किया।
लिख चुके हैं बुक
पॉल अपनी जिंदगी पर एक किताब भी लिख चुके हैं, जिसका नाम 'My Life in an Iron Lung' है। किताब लिखने के पीछे की कहानी के बारे में पॉल कहते हैं कि जिंदगी कैसी भी हो, लेकिन बड़ी चुनौतियों का सामना करके ही आप मंजिल हासिल कर सकते हैं।
अब ऐसी है जिंदगी
पॉल कहते हैं कि लोग उन्हें पसंद नहीं करते, लेकिन वो कभी हारना नहीं चाहते। वे रोजाना सुबह आपकी और हमारी तरह मुंह धोते हैं, ब्रश करते हैं और नाश्ता करके किताबें भी पढ़ते हैं।
पॉल अलेक्जेंडर की ये कहानी ये बताती है कि जिंदगी में लाख कठिनाइयां हों, लाख मुसीबतें हों, लेकिन आपको अपना रास्ता बनाकर आगे बढ़ना चाहिए और देखिएगा यकीनन मंजिल पर आप खुद-ब-खुद पहुंच जाएंगे।