सूरज के पास मौजूद बुध ग्रह (Mercury) के कई रहस्यों का पता लगाने वाला मिशन अपने आखिरी चरण में पहुंच गया है। बुध की तरफ जाने वाले अंतरिक्ष यान अपने प्रमुख अंतरिक्ष यान से अलग होकर अपनी करीब एक दशक लंबी यात्रा के अंतिम चरण की तरफ बढ़ गए, जिनका लक्ष्य सौरमंडल का सबसे छोटा और सूर्य के सबसे करीब स्थित ग्रह बुध है।
यह यूरोप और जापान के संयुक्त अंतरिक्ष यान है, जो निर्धारित योजना के मुताबिक अपने क्रूजर से अलग हो गए। हालांकि, मिशन नियंत्रकों को रेडियो संकेतों के माध्यम से इसकी पुष्टि में दो घंटे तक तनावपूर्ण इंतजार करना पड़ा। इस अहम अभियान का प्रसारण जर्मनी स्थित यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के नियंत्रण केंद्र से किया गया। परियोजना के प्रमुख वैज्ञानिक गेरेंट जोन्स ने कहा कि यह एक शानदार क्षण है।
नवंबर में बुध की कक्षा में करेगा प्रवेश
उनका कहना है कि अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहता है, तो संयुक्त अंतरिक्ष यान बेपीकोलंबो (BepiColombo) नवंबर में बुध की कक्षा में प्रवेश कर लेगा और दिसंबर में दोनों अंतरिक्ष यान एक-दूसरे से अलग हो जाएंगे। इसके बाद वे अलग-अलग ऊंचाइयों से पूरे ग्रह का मानचित्र बनाएंगे और उसका अध्ययन करेंगे।
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2018 में लॉन्च हुआ था बेपीकोलंबो मिशन
बेपीकोलंबो मिशन को 2018 में लॉन्च किया गया था। वैज्ञानिकों ने इस मिशन का नाम इतालवी गणितज्ञ के नाम पर रखा है, जिन्होंने 1970 के दशक में नासा के मेरिनर-10 मिशन में अहम भूमिका निभाई थी। अभी तक बुध का अध्ययन करने वाला सिर्फ एक अन्य अंतरिक्ष यान नासा का मैसेंजर रहा है।
बुध में छिपे हैं सौरमंडल के सबसे बड़े रहस्य
मिशन के मैनेजर सांता मार्टिनेज ने इसी सप्ताह की शुरुआत में बताया था कि बुध कितना छोटा है और फिर भी इसमें हमारे सौरमंडल के कुछ सबसे बड़े रहस्य छिपे हैं। जोन्स का कहना है कि अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे हमें सीखना बाकी है।
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मार्टिनेज ने बताया कि बेपीकोलंबो अभी तक अपने घुमावदार रास्ते पर 600 करोड़ मील (1000 करोड़ किलोमीटर) से ज्यादा की यात्रा कर चुका है। बुध की कक्षा में प्रवेश करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा को कम करने के लिए अंतरिक्ष यान को नौ बार विभिन्न ग्रहों के पास से फ्लाईबाई करना पड़ा। जनवरी 2025 में आखिरी फ्लाईबाई हुई थी। इस दौरान बुध की सतह पर मौजूद प्रभाव गड्ढोंऔर ज्वालामुखीय मैदानों की शानदार तस्वीरें मिली थीं।
क्या करेंगे अध्ययन?
अगले साल से यूरोपीय और जापानी अंतरिक्ष यानों में लगे कई वैज्ञानिक उपकरण बुध के चुंबकीय क्षेत्र, ग्रह के घने आंतरिक हिस्से और उसकी सतह पर होने वाली भूगर्भीय प्रक्रियाओं का अध्ययन करेंगे। इनमें हॉलोज नाम की गड्ढेनुमा संरचनाएं भी शामिल हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि चट्टानों से खनिजों के वाष्पीकृत होने की वजह से ये संरचनाएं धीरे-धीरे क्षरित हो रही हैं।
बुध ग्रह विरोधाभासों से भरी एक अनोखी दुनिया है, जिसका तापमान 800 डिग्री फारेनहाइट (427 डिग्री सेल्सियस) तक पहुंच सकता है, लेकिन इसके ध्रुवीय इलाके बेहद ठंडे हैं। यहां गहरी और हमेशा छाया में रहने वाली क्रेटर संरचनाओं में बर्फ जमी है। सूर्य के बेहद पास होने की वजह से इंजीनियरों को ऐसे अंतरिक्ष यान बनाने पड़े जो बेहद कठोर परिस्थितियों का सामना कर सकें। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के मिशन ऑपरेशंस प्रमुख इग्नासियो टैन्को का कहना है कि यह लगभग ऐसा है जैसे आपकी पीठ के ठीक पीछे एक बेहद गर्म पिज्जा ओवन लगातार चल रहा हो।