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क्यों नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़? क्या फिर आ सकती है तबाही? वैज्ञानिकों का चौंकाने वाला खुलासा

Sun, 30 Aug 2026 06:51 PM IST
धर्मेंद्र कुमार सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला

सार

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने भयानक तबाही मचाई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि लांगटांग–लिरुंग पर्वत पर ग्लेशियर के ढहने से यह आपदा आई। पहाड़ से ग्लेशियर और चट्टान का बड़ा हिस्सा नदी में गिरा और उसका रास्ता कुछ समय के लिए बंद हो गया। इसके बाद जमा पानी अचानक बाहर आया और भयानक बाढ़ आई।
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क्यों नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़? क्या फिर आ सकती है तबाही? वैज्ञानिकों का चौंकाने वाला खुलासा - फोटो : AI
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विस्तार
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नेपाल और तिब्बत की सीमा पर अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस प्राकृतिक आपदा में 768 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 3000 से ज्यादा लोग लापता है। बाढ़ के तेज पानी के साथ बर्फ, पत्थर और मलबा भी नीचे की तरफ आया, जिससे सड़कें, पुल और लोगों के घर बह गए। शुरुआत जांच के मुताबिक लांगटांग–लिरुंग पर्वत पर ग्लेशियर के ढहने से यह आपदा आई। पहाड़ से ग्लेशियर और चट्टान का बड़ा हिस्सा नदी में गिरा और उसका रास्ता कुछ समय के लिए बंद हो गया। इसके बाद जमा पानी अचानक बाहर आया और भयानक बाढ़ आई।

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वैज्ञानिकों का चौंकाने वाला खुलासा

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस घटना में ग्लेशियर के टूटने के साथ ही पहाड़ की बड़ी चट्टान भी खिसकी और अपने साथ ग्लेशियर का हिस्सा लेकर नीचे की तरफ आई। यह मलबा करीब 5,100 मीटर की ऊंचाई से गिरकर करीब 3,000 मीटर तक नीचे आया। फिर यह नदी में पहुंचा और पानी का रास्ता रुक गया। इसके बाद जमा पानी का दबाव बढ़ा, जिससे रुकावट टूट गया। इसके बाद पानी, बर्फ, पत्थर और मिट्टी एक साथ तेज रफ्तार से नीचे की तरफ आने लगे।

इस घटना का असर सिर्फ पहाड़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर तक का इलाका प्रभावित हुआ। कई जगह सड़कें और पुल टूटने के साथ बस्तियों में पानी और मलबा भर गया। हालांकि, अभी भी वैज्ञानिक इस घटना की जांच कर रहे हैं।
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क्या जलवायु परिवर्तन की वजह से हुई घटना?

इस घटना को अभी सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक, बढ़ रहा तापमान हिमालय के ग्लेशियरों और पहाड़ों को कमजोर कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र की 2023 की रिपोर्ट में कहा गया था कि बीते करीब 30 साल में नेपाल के ग्लेशियरों का एक तिहाई बर्फीला हिस्सा खत्म हो चुकी है। 2011 से 2020 के बीच हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियर करीब 65 फीसदी ज्यादा रफ्तार से पिघल रहे। तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं। पहाड़ों के अंदर और जमीन में जमी बर्फ भी पिघलती जा रही है, जिससे चट्टानें कमजोर हो सकती हैं। इसके कारण पहाड़ से बड़े हिस्से के टूटने का खतरा बढ़ने की संभावना है। 

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वैज्ञानिकों का कहना है कि घटना वाले क्षेत्र में अभी भी कुछ बर्फ और पानी जमा हुआ है। इसकी वजह से वहां पर आगे भी लैंडस्लाइड या अचानक बाढ़ आने का खतरा है। नेपाल की इस घटना से पता चलता है कि हिमालय में बढ़ते तापमान का असर सिर्फ ग्लेशियरों तक सीमित नहीं है। ग्लेशियरों के पिघलने और पहाड़ों के कमजोर होने की वजह से नीचे की तरफ रहने वाले लोगों के लिए खतरा है।

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