इसमें स्वीडन, अमेरिका, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे के शोधकर्ताओं का धरती पर मौजूद ग्लेशियरों के नीचे की जमीन का नक्शा बनाया औच चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। उन्होंने बताया कि इस बर्फ का कुछ हिस्सा पिघल जाने पर पृथ्वी 56,659 नई झीलें बनेंगी, जो अभी पूरी तरह से जमी हुई हैं।
ग्लेशियरों के नीचे की जमीन की बनावट का लगाया पता
स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी, अमेरिका की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी, स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लॉजेन और नॉर्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ ओस्लो के शोधकर्ता की टीम ने ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के बर्फ का विश्लेषण किया है। इस शोध के लिए उन्होंने जीपीयू और डीप लर्निंग आधारित इंस्ट्रक्टेड ग्लेशियर मॉडल नामक त्रि-आयामी (3डी) आइस फ्लो मॉडल का इस्तेमाल किया। इसकी मदद से ग्लेशियरों के नीचे मौजूद भूमि की संरचना और उसकी बनावट का पता लगाया।
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वैज्ञानिकों ने यह विश्लेषण इसलिए किया कि अगर ग्लेशियर पूरी तरह से गायब हो जाते हैं, पृथ्वी की सतह कैसी नजर आएगी। ग्लेशियर का आधार सीधे नहीं दिखाई देता है, जिसकी वजह यह प्रक्रिया बेहद जटिल थी। इसके नीचे गहरी घाटियां, गड्ढे, प्राकृतिक बेसिन और ऐसे इलाके छिपे हो सकते हैं। यहां पर पिघला पानी जमा हो सकता है।
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क्यों एशिया में खतरा?
शोधकर्ताओं ने एशियाई क्षेत्रों में ग्लेशियर के किनारों के पास बड़े गड्ढों को खोजा है। ग्लेशेयिर के सबसे नीचे के भाग के पास बनने वाली झीलें अधिक पानी जमा कर सकती हैं। यह आबादी वाली घाटियों, सड़कों, पनबिजली संयंत्रों, खेती वाले इलाकों और गांवों के करीब हो सकती हैं। ग्लेशियर के किनारों के बड़े गड्ढों से संकेत मिलता है कि ग्लेशियर की झील फटने से अचानक बढ़ा आने का खतरा है। अध्ययन में हाई माउंटेन एशिया को ऐसे इलाके तौर पर पहचाना गया, जहां सबसे ज्यादा लोग खतरे में हैं। शोध में बताया गया है कि खतरे की चपेट में आने वाली आधी से अधिक आबादी सिर्फ चार देशों में है, जो भारत, पाकिस्तान, पेरू और चीन हैं।