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3.57 अरब साल पुराने वो पहाड़, जहां से धरती पर हुई थी इंसानी जिंदगी की शुरुआत

Thu, 13 Feb 2020 10:42 AM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मखोंज्वा पर्वत - फोटो : Social media
आज से चार अरब साल से ढाई अरब साल के बीच के दौर को हम आर्केइयन कल्प के तौर पर जानते हैं। उस दौर मे धरती पर कुदरती हंगामा बरपा हुआ था। ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से पूरे माहौल में राख और मलबा बिखरा हुआ था। उल्का पिंड लगातार धरती पर हमला करते रहते थे। सूरज की धुंधली सी रोशनी धरती पर पड़ती रहती थी। उस वक्त हमारी धरती आज से ज्यादा तेज रफ्तार से घूमती थी। इसकी वजह से दिन छोटे होते थे। ये वही दौर था जब धरती पर महाद्वीप बने। इन महाद्वीपों में कई जगह हल्की गहराई वाले पानी के ठिकाने थे, जिनमें रोशनी से दूसरे केमिकल रिएक्शन होने लगे। 
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मखोंज्वा पर्वत - फोटो : Social media
दक्षिण अफ्रीका के एमपुमालंगा सूबे में स्थित मखोंज्वा पर्वत उसी दौर के हैं। बार्बर्टन शहर इन्हीं पहाड़ों के साए में बसा है। मखोंज्वा के पहाड़ आज से 3.57 अरब साल पुराने हैं। ये समंदर से बाहर निकलने वाले जमीन के पहले टुकड़ों में से एक थे। साल 2018 में मखोंज्वा के पहाड़ों को यूनेस्को ने विश्व की धरोहर घोषित किया है। इन्हें बार्बर्टन ग्रीनस्टोन बेल्ट के नाम से भी जाना जाता है। ये धरती पर सबसे पुरानी जमीनी चट्टानों में से एक हैं। 
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मखोंज्वा पर्वत - फोटो : Social media
2014 में बार्बर्टन-मखोंज्वा जियोट्रेल की शुरुआत हुई थी। इसके तहत सैलानियों को इस कुदरती धरोहर की सैर कराई जाती है। ये ट्रेल बार्बर्टन से शुरू होकर ईस्वातिनी यानी पुराने स्वाजीलैंड की सीमा तक जाती थी। ये ट्रेल मखोंज्वा पहाड़ों से होकर गुजरती है। इस ट्रेल से गुजरते हुए आप को धरती के विकास के अरबों साल के इतिहास के सबूत दिखते हैं। यहीं पर जिंदगी का पहला बीज फूटा था। इसीलिए इसे जिंदगी के आगाज का ठिकाना भी कहते हैं। 

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मखोंज्वा पर्वत - फोटो : Social media
इस जियोट्रेल की शुरुआत जर्मनी की जेना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्रिस्टोफर ह्यूबेक और स्थानीय गाईड टोनी फेर्रार ने की थी। इन दोनों ने ही मिलकर इस जियोट्रेल की गाइडबुक भी लिखी है। ये किताब बार्बर्टन टूरिज्म ऑफिस में मिल जाती है। इसे पढ़कर आप ये जान सकते हैं कि मखोंज्वा के पहाड़ों की चट्टानों से वैज्ञानिकों ने क्या जानकारियां जुटाई हैं।  
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बैंडेड आयरन फॉर्मेशन - फोटो : Social media
आर्केइयन कल्प के दौरान धरती पर ऑक्सीजन नहीं थी। उस दौर में जो पहले बैक्टीरिया विकसित हुए, उन्हें फोटोफेरोट्रॉफ्स कहा जाता है, जो उस वक्त समंदर में मौजूद पानी और कार्बन डाई ऑक्साइड को सूरज की रोशनी की मदद से तोड़कर अपने विकास का रास्ता बना रहे थे। जब ये रासायनिक क्रिया करते थे, तो उन बैक्टीरिया से ऑक्सीजन निकलती थी। समंदर में प्रचुर मात्रा में मौजूद लोहे का जब इस ऑक्सीजन से मेल होता था तो आयरन डाई ऑक्साइड बनती थी। ये उस बैक्टीरिया की ऊपरी खोल का काम करती थी। आज जियोट्रेल के दौरान आप अरबों साल पहले ही इस रासायनिक क्रिया के सबूत देख सकते हैं। इस हिस्से को बैंडेड आयरन फॉर्मेशन लेबाय कहते हैं। आयरन ऑक्साइड की वजह से यहां की चट्टानें लाल हो गई हैं। 
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बैंडेड आयरन फॉर्मेशन - फोटो : Social media
टोनी फेर्रार कहते हैं कि, 'बैक्टीरिया की लोहे से बनी इस ऊपरी खोल में जंग लग गई और ये समंदर में डूब गई। करोड़ों साल बाद ये सारा लोहा समंदर से बाहर आया और इनसे जो ऑक्सीजन आजाद हुई, वो धरती की आबो-हवा में फैलने लगी। इससे धरती पर ऑक्सीजन की तादाद बढ़ी और बहुकोशिकीय जीवों का विकास शुरू हुआ। आज जिस हवा से हम सांस लेते हैं, ये उन्हीं बैक्टीरिया की बनाई हुई है।'
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मखोंज्वा पर्वत का इलाका - फोटो : Social media
जब इस इलाके में जिंदगी के पहले सबूत वैज्ञानिकों ने ढूंढे, उससे बहुत पहले लोगों ने यहां एक और खजाना तलाश लिया था और वो था-सोना। थोड़ा-बहुत सोना तो 1874 में डे काप घाटी में ही खोज लिया गया था, लेकिन इसे बेचकर कमाई नहीं की जा सकती थी। बाद में दो भाइयों हेनरी और फ्रेड बारबर ने अपने चचेरे भाई ग्राहम की मदद से यहां सोने के ठिकाने 1884 में खोजे। इसके बाद तो यहां सोने की तलाश का काम तेज हो गया। 24 जुलाई 1884 को डेविड विलसन नाम के सोने के कमिश्नर ने बारबर भाईयों के सम्मान में इस कस्बे का नाम बार्बर्टन रखा। इसके पास स्थित मूंगे की चट्टानों को भी बारबर रीफ नाम दिया गया। इसके बाद बहुत से लोग अपनी किस्मत आजमाने यहां आए।

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बार्बर्टन-मखोंज्वा जियोट्रेल - फोटो : Social media
कहा जाता है कि इस इलाके में इतना सोना था कि लोग चट्टानों से सोने को नहीं बल्कि सोने से चट्टानों के टुकड़े अलग किया करते थे। इसका सबसे बड़ा ठिकाना गोल्डेन क्वैरी थी, जो शेबा खदान का हिस्सा थी। इसे दुनिया की सबसे दौलतमंद सोने की खदान कहते हैं। आज भी यहां सोने की तलाश में खुदाई होती है। ये दक्षिण अफ्रीका की सबसे पुरानी सोने की खदान है, जिसमें खुदाई का काम होता है। ये खदान पिछले 130 सालों से चल रही है। 

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यूरेका सिटी - फोटो : Social media
शेबा रीफ के पास बसा है यूरेका सिटी। ये सुनहरी खदान यानी गोल्डेन क्वैरी की तलाश के बाद बसाया गया था। एक दौर था कि यहां 700 लोग रहते थे। तब यूरेका सिटी में दुकानें थीं, होटल थे, म्यूजिक हॉल था, लॉन टेनिस के दो कोर्ट थे। यहां एक घुड़सवारी ट्रैक भी था। 1885 में यहां सोने की तलाश में मची भगदड़ यानी गोल्डेन रश के दौर में 28 पब खुले हुए थे। ये सभी 20 किलोमीटर के दायरे में स्थित थे। इनमें शराब के बदले में गिन्नियां दी जाती थीं। लेकिन, 1924 के आते-आते यूरेका शहर वीरान होने लगा था। 1886 में यहां से 360 किलोमीटर दूर सोने का दूसरा खजाना मिलने के बाद इस शहर से लोग उधर कूच कर गए। बाद में ये नया ठिकाना ही आज के जोहानिसबर्ग शहर के तौर पर विकसित हुआ। 

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यूरेका सिटी, दक्षिण अफ्रीका - फोटो : Social media
आज यूरेका सिटी मखोंज्वा पहाड़ों के बीच स्थित माउंटेनलैंड्स नेचर रिजर्व का हिस्सा है। इसकी विरासत संभालने की वजह से आप यहां सिर्फ उन टूर के साथ आ सकते हैं, जिसकी इजाजत मिली हो। सोने की तलाश में शुरू हुई गोल्ड रश का नतीजा ये हुआ कि मखोंज्वा के पहाड़ों की तरफ सिर्फ सोना खोजने वाले नहीं बल्कि लेखक और दूसरे तरह के लोग भी आए। इसी दौर में घुमंतू कलाकार के तौर पर मशहूर कोनराड फ्रेडरिक गेनाल ने भी बार्बर्टन का रुख किया। 

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1890 के दशक का बार्बर्टन शहर का ट्रांसवाल होटल - फोटो : Social media
जर्मन मूल के फ्रेडरिक फ्रांस के विदेश विभाग में नौकरी करते थे। 1890 के दशक में महज 19 बरस की उम्र में फ्रेडरिक ने अपने जहाज से उस वक्त भागने की कोशिश की जब वो स्वेज नहर से गुजर रहा था। सिपाहियों ने उन्हें पीछे से गोली मार दी थी। बाद में गेनाल ने एक कारोबारी का भेष धर कर पूरे अफ्रीका की सैर की। वो कुछ दिनों तक बार्बर्टन शहर में भी रहे। बाद में फ्रेडरिक ने डरबन शहर का रुख किया। 1939 में फ्रेडरिक की वहीं मौत हो गई। पूरे सफर के दौरान फ्रेडरिक ने पेंटिंग करके अपना गुजारा किया। वो उन चर्चों, होटलों और शहरों की पेंटिंग बनाते थे, जहां वो घूमने जाया करते थे। आज उनकी बनाई हुई पेंटिंग को बार्बर्टन शहर के ट्रांसवाल होटल की दीवारों पर देखा जा सकता है। पास के डिगर्स रिट्रीट होटल में भी उनकी कुछ पेटिंग रखी हुई हैं। 

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बार्बर्टन की नदी - फोटो : Social media
बार्बर्टन की नदी की तलहटी में आज भी सोना मिल जाता है। यहां घूमने आने वाले लोग साउथ काप नदी के पानी में से सोना निकालने की कोशिश कर सकते हैं। नदी के पानी में से आसानी से सोने के कण छांटे जा सकते हैं। स्थानीय गाइड एंगेलब्रेख्त ने नदी के पानी को लगातार छानकर मुझे सोना निकालना सिखाया। एंगेलब्रेख्त कहते हैं कि सोने में कुछ तो खास है। लोग इसके लिए पागल हो जाते हैं। 
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मखोंज्वा पर्वत - फोटो : Social media
मखोंज्वा पहाड़ों की तलहटी पर बना हुआ है, 'द फाउंटेन होटल ऐंड बाथ'। ये होटल 1884 में शुरू हुआ था। तब ये केवल सार्वजनिक हम्माम था। ये यहां पर दुनिया भर से आकर सोने की खदानों में काम करने वालों के लिए स्नानघर भर था। ये दक्षिण अफ्रीका के इस सूबे का पहला स्विमिंग पूल भी था। अब इसका नाम बदलकर फाउंटेन बाथ्स गेस्ट कॉटेज कर दिया गया है। पुराने स्विमिंग पूल की जगह पर ही नया स्विमिंग पूल बनाया गया है। इसके मालिकों एस्मारी और निक हैरोड के पास पुराने अखबारों की कतरनें हैं। इनमें इस होटल का इतिहास बयां है। बहुत से लोगों का इस होटल से पीढ़ियों का नाता रहा है। एस्मारी कहते हैं कि लोगों को होटल के इतिहास में बहुत दिलचस्पी है। इसीलिए उन्होंने इसका इतिहास बताने वाली एक श्रृंखला शुरू की है। ये टाइमलाइन बदलते वक्त की गवाह है।  
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