एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, लॉयड ऑलसेन और उनकी पत्नी क्लारा 10 सितंबर 1945 को कोलोराडो के फ्रूटा स्थित अपने फार्म पर मुर्गियां काट रहे थे। इस दौरान एक मुर्गा सिर कटने के बाद भी नहीं मरा और भागने लगा। 'माइक द हेडलेस चिकन' की यह कहानी है। सिर कट जाने के बाद भी मुर्गा जिंदा था और इधर-उधर घूम रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, किसान के पोते ट्रॉय वाटर्स ने जानकारी दी थी कि सिरकटे मुर्गे ने मेरे दादा को लात मारकर भागता चला गया।
इसके बाद किसान ने सिरकटे मुर्गे को एक डिब्बे में रख दिया। फिर जब लॉयड ऑलसेन जागने के बाद डिब्बा खोलकर देखा तो हैरत में पड़ गए, क्योंकि मुर्गा अब भी बिना सिर के जिंदा था। किसान की पत्नी ने कहा कि यह हमारे अजीब पारिवारिक इतिहास का हिस्सा है।
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इसके बाद वैज्ञानिकों ने इस घटना को गहराई से समझने की कोशिश की। विशेषज्ञों ने बताया कि मुर्गे का दिमाग आगे नहीं बल्कि पीछे की तरफ रहता है। माइक के मामले में कुल्हाड़ी का वार ऐसा पड़ा कि उसका चेहरा, चोंच और आंखें तो कट गईं, लेकिन ब्रेन स्टेम सुरक्षित रह गया। यही हिस्सा शरीर के जरूरी काम जैसे सांस लेना, दिल की धड़कन और पाचन को नियंत्रित करता है।
आमतौर पर सिर काट देने पर खून बहने से मौत हो जाती है, लेकिन माइक के साथ ऐसा नहीं हुआ। इसकी वजह एक ब्लड क्लॉट था। सिर कटते ही खून का थक्का जम गया। इसकी वजह से ज्यादा खून नहीं बहा। कारण यह रहा है कि माइक तुरंत नहीं मरा और उसका शरीर काम करता रहा। यह एक बेहद दुर्लभ जीववैज्ञानिक घटना थी।
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ऐसे रहा जिंदा
किसान लॉयड ऑलसेन ने मुर्गा को जिंदा रखने के लिए उसकी विशेष देखभाल की। वह सिरिंज की मदद से माइक की ग्रासनली में दूध, पानी और मक्के का तरल भोजन डालते थे। सांस की नली में जमा म्यूकस को भी सिरिंज से साफ करते थे। इसकी देखभाल की वजह से माइक 18 महीने यानी करीब डेढ़ साल तक जिंदा रहा।