क्या है पूरा मामला?
दरअसल, लगभग आठ साल पहले, कुनीबेलाकेर गांव के लोगों ने अपनी देवी करियम्मा को एक भैंस समर्पित की थी। हाल ही में, बेलेकर गांव में एक लावारिस भैंस मिली, जिसके बाद विवाद शुरू हो गया। कुलगत्ते गांव के लोगों का दावा है कि यह भैंस उनके गांव से दो महीने पहले खो गई थी और वे इसे वापस अपने गांव ले गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुलगत्ते गांव के लोगों का कहना है कि यह भैंस उनके गांव से दो महीने से लापता हुई थी। दूसरी ओर, कुनीबेलाकेर गांव के लोग इस भैंस पर अपना अधिकार जता रहे हैं, उनका कहना है कि यह वही भैंस है जो उन्होंने देवी को समर्पित की थी। इस आरोप-प्रत्यारोप के चलते दोनों गांवों के बीच तनाव बढ़ गया, जिसके बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। स्थिति को नियंत्रण में रखने और सच्चाई का पता लगाने के लिए, पुलिस ने भैंस का डीएनए टेस्ट कराने का फैसला किया है।
उम्र को लेकर भी विवाद
भैंस की उम्र को लेकर भी दोनों गांवों के बीच मतभेद है। कुनीबेलाकेर गांव के लोगों का कहना है कि भैंस आठ साल की है, जबकि कुलगत्ते गांव के लोग उसकी उम्र तीन साल बता रहे हैं। पशु चिकित्सकों द्वारा की गई जांच में भैंस की उम्र छह साल पाई गई, जो कुनीबेलाकेर गांव के दावे के काफी करीब है। हालांकि, कुलगत्ते गांव के लोग इस परिणाम से सहमत नहीं हैं, जिसके कारण विवाद और बढ़ गया।
पुलिस का हस्तक्षेप और डीएनए टेस्ट
मामले की गंभीरता को देखते हुए, कुनीबेलाकेर गांव के लोगों ने कुलगत्ते गांव के सात लोगों के खिलाफ चोरी का मामला दर्ज कराया और भैंस का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की। देवनागरी जिले के एडिशनल एसपी विजयकुमार संतोष ने जानकारी दी कि डीएनए नमूने एकत्र कर लिए गए हैं और अब रिपोर्ट का इंतजार है। डीएनए रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि वास्तव में भैंस का असली मालिक कौन है और विवाद का निपटारा हो सकेगा।
पहले भी हो चुका है ऐसा मामला
यह पहली बार नहीं है जब देवनागरी जिले में इस तरह का मामला सामने आया है। साल 2021 में भी ठीक ऐसा ही एक विवाद हुआ था, जहां एक भैंस के मालिकाना हक को लेकर दो गांवों के बीच झगड़ा हुआ था। उस वक्त भी डीएनए टेस्ट के माध्यम से ही विवाद का समाधान किया गया था। इस घटना से यह स्पष्ट है कि डीएनए टेस्ट पशुओं के मालिकाना हक से जुड़े विवादों को सुलझाने में एक प्रभावी तरीका साबित हो रहा है।