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एक ऐसा देश, जो हर साल बना रहा है एक नया 'लंदन'

Sun, 28 Jun 2020 01:06 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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नानजिंग ग्रीन टॉवर्स, चीन - फोटो : Social media
आबादी के लिहाज से चीन दुनिया का सबसे बड़ा देश है। आर्थिक उन्नति के क्षेत्र में भी वो दुनिया में अपना लोहा मनवा चुका है। बड़ी आबादी के रहने और आर्थिक गतिविधियां सुचारू रूप से चलाने के लिए उसी अनुपात में इमारतों की भी जरूरत है। चीन इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम कर रहा है। 

जानकारों का कहना है कि आने वाले दशक में दुनियाभर में जितनी इमारतें बनेंगी, उनमें से आधी इमारतें सिर्फ चीन में होंगी। चीन में पहले ही हर साल दो अरब वर्ग मीटर फ्लोर स्पेस तैयार होता है। अगर ये इमारतें एक मंजिला हैं, तो भी इनका कुल क्षेत्रफल पूरे लंदन के क्षेत्रफल के बराबर होगा। कार्बन उत्सर्जन के लिहाज से ये एक बहुत बड़ा आंकड़ा है। 
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चीन की एक ग्रीन इमारत - फोटो : Facebook/stefanoboeriarchitetti.net
आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने के साथ ही चीन ने भवन निर्माण को भी रफ्तार दी है। इसी के साथ इन इमारतों में ऊर्जा का उपयोग भी बढ़ा, जिसने पर्यावरण के लिए चुनौती पैदा कर दी। वर्ष 2001 से 2016 के दरमियान चीन के निर्माण क्षेत्र में एक अरब टन कोयले के बराबर ऊर्जा की खपत हुई है। कच्चे माल की आपूर्ति से लेकर भवन निर्माण तक जितनी ऊर्जा का इस्तेमाल हुआ, वो चीन के कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग पांचवा हिस्सा है। इतने व्यापक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन इंसान और पर्यावरण दोनों के लिए खतरे की घंटी है।

इस खतरे को चीन के लोगों ने महसूस भी किया है, और उसकी कीमत भी चुकाई है। इसीलिए अब इमारतें बनाने के ऐसे नए तरीकों पर काम किया जा रहा है जिससे कार्बन उत्सर्जन कम हो सके। इसके लिए अभी तक का सबसे कारगर तरीका इमारतों को पौधों से ढक देना है। 
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चीन की ग्रीन इमारत - फोटो : Social media
इटली में सबसे पहले हुआ था प्रयोग

इस तरह का प्रयोग सबसे पहले एक इटैलियन वास्तुकार स्टेफानो बोरी ने इटली के मिलान शहर में किया था और अब बोरी की टीम यही प्रयोग चीन में भी करने जा रही है। चीन के नानजिंग शहर में ऐसे ही दो ग्रीन टावर तैयार करने पर काम हो रहा है, जो पूरी तरह हरियाली से ढंके होंगे। ये टावर साल 2020 के अंत तक तैयार कर लिए जाने थे, लेकिन महामारी की वजह से समय पर काम पूरा नहीं हो पाएगा। बिल्डिंग के आगे बढ़े हुए हिस्से में 2500 तरह की झाड़ियां, एक हजार से ज्यादा पेड़ और अन्य पौधे लगाए जाएंगे। फिलहाल बिल्डिंग की सामने वाली दीवारों पर लगाने के लिए 600 तरह के स्थानीय पेड़ नर्सरी में तैयार किए जा रहे हैं। जब तक इन्हें बिल्डिंग में लगाया जाएगा इनकी लंबाई छह से नौ मीटर तक हो जाएगी। 

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चीन की ग्रीन इमारत - फोटो : Social media
इन पेड़ों को लगाने से पहले इनकी क्षमता जांची जाएगी और इन्हें विंड-टनल से गुजारा जाएगा। उसके अनुसार ही पेड़ों को बिल्डिंग के अलग-अलग फ्लोर पर लगाया जाएगा। चीन के कई प्रांतों में हरियाली को ऊंची इमारतों का जरूरी हिस्सा बनाने वाली नीतियां लागू की गई हैं। मिसाल के लिए झेजियांग प्रांत में स्काई गार्डेन बालकनी बनाई गई हैं, लेकिन इन्हें प्लॉट के कुल क्षेत्रफल से छूट दी जाती है। यानि जब प्लॉट का एरिया मापा जाता है, तो ये हरी बालकनी उसमें शामिल नहीं होती। ये एक तरह का बोनस होता है। 
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चीन का एक हरा-भरा इलाका - फोटो : Social media
किसी बिल्डिंग को हरा भरा बनाने के लिए बहुत प्लानिंग की जरूरत होती है और बढ़ता कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित करने के लिए हरियाली ही फिलहाल एक मात्र रास्ता है। अगर बिल्डिंगों के बाहर हरियाली रखने का चलन शुरू हो जाए तो चीन में भवन निर्माण उद्योग से होने वाला कार्बन उत्सर्जन काफी हद तक कम हो सकता है। 

वहीं कुछ जानकारों का ये भी कहना है कि बिल्डिंग बनाने में इस्तेमाल होने वाले मैटेरियल में भी सुधार करना होगा। मिसाल के लिए अकेले सीमेंट ही एक साल में दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का आठ फीसदी का जिम्मेदार है। अगर कंस्ट्रक्शन मैटेरियल को रीसाइकिल कर लिया जाए तो कार्बन उत्सर्जन काफी हद तक कम हो जाएगा। इस दिशा में चीन की विनसन कंपनी ने काम शुरू भी कर दिया है। इस काम के लिए ये कंपनी थ्री-डी तकनीक का सहारा ले रही है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Ingenia TEK
नई इमारत बनाने के लिए बेकार सामग्री को पीस कर इस्तेमाल करने से भी ज्यादा बेहतर है कि जो चीजें पहले से मौजूद हैं उनका इस्तेमाल किया जाए। ग्रीन आर्किटेक्चर डिजाइन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर ल्यू हेंग कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। उन्होंने एक पुरानी फैक्ट्री के बेकार पड़े हिस्से को पुराने कांच और सीमेंट के टुकड़ों की मदद से नया रूप देकर अपने लिए तैयार कर लिया। उन्होंने कॉरिडोर के चारों तरफ पर्दे वाली ऐसी दीवारें बनाईं, जो बाहर की गर्म हवा को अंदर नहीं आने देतीं और अंदर का तापमान नियंत्रित रहता है। ल्यू कहते हैं कि थ्री-डी प्रिंटिंग इस काम में काफी कारगर साबित हो सकती है। इससे मजदूरी और मटेरियल दोनों की बचत भी हो जाएगी। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
चीन में ऐसी इमारतें बनाने पर भी काम किया जा रहा है, जिन्हें बिना किसी यांत्रिक साधन के ठंडा या गर्म रखा जा सकता है। इसका प्रयोग सबसे पहले 2005 में बीजिंग की पेकिंग यूनिवर्सिटी की इमारत में हुआ था। इस इमारत के गलियारे इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि वो सर्दी में गर्म और गर्मी में ठंडे रहते हैं साथ ही कुदरती रोशनी भी भरपूर रहती है और बिजली की खपत नहीं के बराबर होती है। क्लासरूम में बिजली का सिस्टम भी कुछ ऐसे विकसित किया गया है कि वहां किसी की मौजूदगी में ही लाइट जलती हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
वास्तुकला क्षेत्र के लोगों को उम्मीद है कि जिस तरह इमारतों के लिए नए डिजाइन बनाए जा रहे हैं, वो बहुत स्थाई हैं और चीन की सरकार उन्हें आगे बढ़ाने में मदद करेगी। 2018 तक चीन में दस हजार से ज्यादा ग्रीन प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी जा चुकी है। 2017 में चीन ने तय किया था कि 2020 तक जितनी इमारतें बनाई जाएंगी, उनमें से 50 फीसदी ग्रीन बिल्डिंग होंगी। 

चीन में शहरी विकास की दर तेज है। लिहाजा यहां बदलाव की रफ्तार भी तेज होगी। अगर इस दशक में दुनिया के कुल बनने वाली इमारतों में से आधी अगर चीन में बनने वाली है तो इस नए तरीके एक बहुत बड़ा बदलाव आएगा। अगर चीन अपने यहां 50 फीसदी इमारतें भी हरियाली से भरपूर कर लेता है तो दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में भारी गिरावट आ जाएगी। 
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