अंटार्कटिका में 695 अरब टन बर्फ बढ़ी, वैज्ञानिकों का चौंकाने वाला खुलासा
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दशकों से वैज्ञानिक अंटार्कटिका में बर्फ की कमी को लेकर चिंता जा रहे हैं। पर्यावरणविदों के मुताबिक, ग्लेशियरों की बर्फ पिघलकर समुद्र में गिर रही है। इससे समुद्र का पानी बढ़ रहा है। उन्होंने इसकी मुख्य वजह जलवायु परिवर्तन को बताया है। लेकिन वैज्ञानिकों ने वर्ष 2021 और 2023 के बीच इस महाद्वीप में एक ऐसा बदलाव देखा है, जो असामान्य है। वैज्ञानिकों को पता चला है कि 22 महीनों में बर्फ का द्रव्यमान कम होने की जगह 695 अरब टन बढ़ा है। यह बीते दो दशकों में सबसे बड़ी बढ़ोतरी है।
हर वर्ष पिघल रही अरबों टन बर्फ
ब्रिटिश जर्नल नेचर में एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है। इस अध्ययन के मुताबिक, असामान्य बढ़ोतरी मुख्य तौर पर पूर्वी अंटार्कटिका के कुछ इलाकों में हुई भारी बर्फबारी की वजह से हुई थी। शोधकर्ताओं को अध्ययन में पता चला कि 2003 और 2024 के बीच महाद्वीप का औसत द्रव्यमान नुकसान करीब 140 अरब टन प्रति वर्ष था, लेकिन जुलाई 2021 और अप्रैल 2023 के बीच इस संतुलन में तेजी से बदलाव आया।
कैसे बढ़ी बर्फ?
अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बर्फबारी में बढ़ोतरी का संबंध उष्णकटिबंधीय महासागर के एक इलाके में गर्मी से जोड़ा है। इसे ट्रॉपिकल वार्म पूल के नाम से जाना जाता है। अध्ययन के लेखकों ने जानकारी दी कि सबसे बड़ा बदलाव पूर्व अंटार्कटिका और अंटार्कटिका प्रायद्वीप में आया है, तो वहीं पश्चिमी अंटार्कटिका के कुछ इलाकों में बर्फ का पिघलना जारी रहा।
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वैज्ञानिकों ने क्वीन मैरी लैंड और विल्क्स लैंड में सबसे बड़ा जमाव देखा। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि करीब 470 अरब टन बर्फ की बढ़ोतरी हुई है। शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट से मिली जानकारी और बारिश/बर्फबारी व जलवायु डेटा की तुलना की है। इसमें पता चला कि असामान्य रूप से भारी बर्फबारी ही इस बढ़ोतरी की वजह है।
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हालांकि, शोधकर्ता इस बढ़ोतरी के बाद भी नहीं मानते कि यह घटना अंटार्कटिका में बर्फ की वृद्धि के दीर्घकालिक दौर के रूप में देखी जानी चाहिए। इस दौरान श्चिमी अंटार्कटिका में बर्फ कम होती रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि उन इलाकों में जहां पहले से ही दीर्घकालिक गिरावट हो रही थी। शोधकर्ताओं का अध्ययन में अनुमान है कि क्वीन मैरी लैंड और विल्क्स लैंड क्षेत्र में बारिश में आया अंतर मानवजनित कारकों का योगदान 9 फीसदी था।