बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। चुनावी रण में इस बार मोहरे जरूर पुराने हैं, लेकिन चाल सबकी नई है। मुख्य मुकाबला दो गठबंधनों के बीच दिखाई दे रहा है, लेकिन गठबंधनों की ढीली गांठ पूरे चुनावी माहौल को दिलचस्प बनाए हुए है। सुबह जाति के खोल से निकल विकास के मुद्दे पर बात करने वाले शाम को फिर जाति के खोल में समा जाते हैं।
सामाजिक और जातीय समीकरण लामबंद होकर बिखर रहे हैं। वहीं, मतदाताओं की चुप्पी विश्लेषकों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। मुकाबला नरेंद्र मादी के नेतृत्व वाले राजग और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन के बीच ही है, लेकिन वाम दलों की एका तीसरे गठबंधन के रूप में मैदान में है। वैसे पप्पू, सपा, एनसीपी और ओवैशी चौथे विकल्प या वोट कटुआ की भूमिका में खुद को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।
ऐसे में यह कहना गलत होगा कि वोट दो भागों में ही बंटेंगे। दूसरी ओर पहले एनसीपी और बाद में सपा के अलग होने से महागठबंधन की गांठ कमजोर हुई है।