बांस का एक टुकड़ा व कुछ नपे-तुले सुराख और फिर उसमें से निकलती मधुर तान। बिहार की अति प्राचीन औद्योगिक नगर के रूप में पहचान और नारद मोहभंग वाली एतिहासिक, सांस्कृतिक और गौरवशाली धरती कही जाने वाली मढ़ौरा प्रखंड के मिर्जापुर और आसपास के गांवों में यह सिर्फ बांसुरी बनाने का हुनर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा है, जिसमें परिवारों की रोजी-रोटी और लोक संस्कृति दोनों की धड़कन सुनाई देती है।
बांसुरी में मिठास और सुरों का संतुलन ही हुनर की पहचान
घर में तैयार बांसुरी, दूसरे राज्यों तक बाजार: कारीगर नूर हसन
कारीगर सह स्थानीय निवासी नूर हसन बताते हैं कि बांसुरी बनाने का यह काम उनके परिवार में कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। क्षेत्र के दर्जनों परिवारों की आजीविका भी इसी छोटे से कुटीर उद्योग पर निर्भर है। त्योहार और मेले इनके लिए सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि साल भर की मेहनत को बाजार तक पहुंचाने का बड़ा अवसर भी हैं।
मिर्जापुर के कारीगरों ने अपने पुश्तैनी हुनर का साथ नहीं छोड़ा
लेकिन सुरों की इस दुनिया के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। प्लास्टिक के खिलौनों और बाजार में उपलब्ध सस्ते विकल्पों ने पारंपरिक बांसुरी की बिक्री पर असर डाला है। दूसरी ओर, बांस जैसे कच्चे माल की उपलब्धता में कमी और प्राकृतिक आपदाओं, खासकर बाढ़, ने कारीगर परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
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बांसुरी बनाते ग्रामीण कारीगर
बांसुरी बनाते ग्रामीण कारीगर