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बिहार: बांस का टुकड़ा, सुरों के सुराख और मधुर तान, मढ़ौरा में आज भी जिंदा है बांसुरी बनाने का पुश्तैनी हुनर

Thu, 08 Oct 2026 07:44 PM IST
सारण ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा

सार

सारण के मढ़ौरा प्रखंड के मिर्जापुर और आसपास के गांवों में बांसुरी बनाने का पुश्तैनी हुनर आज भी जीवित है। दशहरा मेले को लेकर कारीगर इन दिनों बांसुरियां तैयार करने में जुटे हैं। यहां बनी बांसुरियों की मांग बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश और केरल के मेलों तक रहती है।
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बांसुरी बनाते ग्रामीण कारीगर
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विस्तार
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बांस का एक टुकड़ा व कुछ नपे-तुले सुराख और फिर उसमें से निकलती मधुर तान। बिहार की अति प्राचीन औद्योगिक नगर के रूप में पहचान और नारद मोहभंग वाली एतिहासिक, सांस्कृतिक और गौरवशाली धरती कही जाने वाली मढ़ौरा प्रखंड के मिर्जापुर और आसपास के गांवों में यह सिर्फ बांसुरी बनाने का हुनर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा है, जिसमें परिवारों की रोजी-रोटी और लोक संस्कृति दोनों की धड़कन सुनाई देती है।

बांसुरी में मिठास और सुरों का संतुलन ही हुनर की पहचान

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दशहरा मेले की आहट के साथ इन गांवों में इन दिनों बांसुरियां बनाने का काम तेज हो गया है। घरों में सुबह से देर शाम तक बांस को आकार देने और उसे सुर देने का काम चल रहा है। यहां बांसुरी बनाना किसी कारखाने का काम नहीं, बल्कि घर-परिवार से जुड़ा एक तरह का पुश्तैनी कारोबार है, जिसमें परिवार के बच्चे हों या महिलाएं, बुजुर्ग हों या युवा, हर कोई अपनी भूमिका निभाता है। कोई बांस को काटकर सही आकार देता है तो कोई उसमें सुराख करता है। इसके बाद बांसुरी को इस तरह तराशा जाता है कि उससे निकलने वाली आवाज में मिठास और सुर का संतुलन बना रहे।

घर में तैयार बांसुरी, दूसरे राज्यों तक बाजार: कारीगर नूर हसन
कारीगर सह स्थानीय निवासी नूर हसन बताते हैं कि बांसुरी बनाने का यह काम उनके परिवार में कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। क्षेत्र के दर्जनों परिवारों की आजीविका भी इसी छोटे से कुटीर उद्योग पर निर्भर है। त्योहार और मेले इनके लिए सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि साल भर की मेहनत को बाजार तक पहुंचाने का बड़ा अवसर भी हैं।

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मिर्जापुर में तैयार होने वाली बांसुरियां केवल आसपास के बाजारों तक सीमित नहीं रहती हैं, बल्कि स्थानीय बाजारों के साथ उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और केरल राज्य में लगने वाले मेलों में भी इनकी मांग रहती है। यानी गांव के घरों में तैयार होने वाला यह पारंपरिक उत्पाद स्थानीय कारीगरों को दूसरे राज्यों के बाजारों से भी जोड़ता है।

मिर्जापुर के कारीगरों ने अपने पुश्तैनी हुनर का साथ नहीं छोड़ा
लेकिन सुरों की इस दुनिया के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। प्लास्टिक के खिलौनों और बाजार में उपलब्ध सस्ते विकल्पों ने पारंपरिक बांसुरी की बिक्री पर असर डाला है। दूसरी ओर, बांस जैसे कच्चे माल की उपलब्धता में कमी और प्राकृतिक आपदाओं, खासकर बाढ़, ने कारीगर परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

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लेकिन इसके बावजूद मिर्जापुर के कारीगरों ने अपने पुश्तैनी हुनर का साथ नहीं छोड़ा है। उनके लिए बांसुरी महज एक खिलौना या बिक्री का सामान नहीं, बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और परिवार की आजीविका से जुड़ी हुई विरासत भी है। दुर्गा पूजा के अवसर पर लगने वाले दशहरा मेले के लिए तैयार होती हर बांसुरी में इसी उम्मीद की धुन है कि अगली पीढ़ी तक यह सुर और यह हुनर दोनों जिंदा रहें।

बांसुरी बनाते ग्रामीण कारीगर

 

बांसुरी बनाते ग्रामीण कारीगर

 

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