कारगिल विजय दिवस के मौके पर सीवान जिले के आंदर प्रखंड स्थित चितौर गांव एक बार फिर शहीद रम्भू सिंह की शहादत को याद कर गर्व से भर गया। आज से ठीक 26 साल पहले 20 जून 1999 को कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लोहा लेते हुए रम्भू सिंह वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनकी शहादत की खबर जब गांव पहुंची, तो पूरा इलाका शोक में डूब गया था। गांव में पूरे एक सप्ताह तक किसी घर में चूल्हा नहीं जला था।
रम्भू सिंह वर्ष 1991 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। कारगिल युद्ध के समय उनकी पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर में थी। दुश्मनों से लोहा लेते हुए वे 20 जून 1999 को शहीद हो गए। जब उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा तो हजारों की संख्या में लोग अंतिम दर्शन के लिए उमड़े। पूरा गांव गमगीन था, और परिवार पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। शहीद के अंतिम संस्कार के वक्त नेताओं की भीड़ उमड़ पड़ी थी। सभी ने गांव के विकास, सड़क, स्मारक और अन्य सुविधाओं के लिए बड़े-बड़े वादे किए। लेकिन समय बीतता गया और सभी वादे धरे के धरे रह गए। आज भी चितौर गांव की सड़कों की हालत जर्जर है, पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है, और ना ही प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा मौजूद है।
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एक स्मारक, जो बदहाली का शिकार
गांव में शहीद रम्भू सिंह की एक प्रतिमा और उनके नाम पर एक स्कूल जरूर है, लेकिन प्रतिमा की नियमित देखभाल नहीं होती। गांव के कुछ स्थानीय लोग और पड़ोसी हर वर्ष 26 जुलाई को माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि देते हैं। लेकिन न कोई जनप्रतिनिधि आता है, न कोई अधिकारी। गांव वाले कहते हैं कि जब-जब कारगिल विजय दिवस आता है, तब-तब रम्भू सिंह की यादें ताजा होती हैं, लेकिन बाकी वर्ष भर गांव उपेक्षा का शिकार रहता है।
शहीद की पत्नी का दर्द
शहीद रम्भू सिंह की पत्नी सुनीता कंवर आज दिल्ली में रहती हैं, लेकिन उनका दिल आज भी गांव के हालात देखकर दुखी होता है। उन्होंने कहा कि नेताओं ने आंदर बाजार में शहीद द्वार बनाने, गांव की मुख्य सड़क का नामकरण और प्रतिमा सौंदर्यीकरण का वादा किया था, लेकिन कुछ भी पूरा नहीं हुआ। शहीद की पत्नी ने कहा कि अगर सरकार एक शहीद के साथ ऐसा व्यवहार कर रही है, तो आम नागरिकों का क्या हाल होता होगा, आप खुद सोचिए।
गांव वालों की व्यथा
गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि यदि उस समय किए गए आधे वादे भी पूरे हो गए होते, तो गांव की तस्वीर कुछ और होती। 26 वर्षों में कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन चितौर गांव की हालत जस की तस बनी रही। आज भी गांववाले उसी उम्मीद में हैं कि कभी कोई जिम्मेदार नेता या अधिकारी यहां की बदहाली देखेगा और सुधार की दिशा में काम होगा