शहीद जवान मनीष को अंतिम बिदाई देने उमड़े हजारों लोग
- फोटो : अमर उजाला
पत्नी से किया वादा अधूरा रह गया
मनीष तिवारी ने 15 दिसंबर की रात अपनी पत्नी श्रेया तिवारी से फोन पर बात कर 17 दिसंबर को घर लौटने का वादा किया था। लेकिन 16 दिसंबर को देश की सुरक्षा में आतंकियों से लड़ते हुए वह शहीद हो गए। 17 दिसंबर को उनका शव गांव पहुंचा, लेकिन वह परिवार के साथ होने का अपना वादा निभा नहीं सके।
शोक में डूबा गांव
गांव तिवारी चफवा में मनीष की शहादत के बाद गम का माहौल है। हर घर से लोगों ने उनकी अंतिम यात्रा में भाग लिया। उनकी शहादत पर गर्व करते हुए भी ग्रामीणों की आंखें गमगीन थीं। मनीष के पिता मार्कंडेय तिवारी और मां ललिता देवी का रो-रो कर बुरा हाल है। परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य के चले जाने से उनकी स्थिति और अधिक दयनीय हो गई है।
शहीद जवान मनीष को अंतिम बिदाई देने उमड़े हजारों लोग
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परिवार ने सरकार से की मदद की मांग
मनीष के पिता ने सरकार से मांग की है कि उनके दूसरे बेटे अमित तिवारी को सेना में नौकरी दी जाए, ताकि परिवार को सहारा मिल सके। मनीष की पत्नी श्रेया और उनके बच्चों की देखभाल के लिए भी गांव वालों ने सरकार से आर्थिक सहायता की गुहार लगाई है।
गांव के लिए गर्व, परिवार के लिए अपूरणीय क्षति
2012 में सेना में भर्ती हुए मनीष तिवारी की शहादत ने उनके गांव को गर्व का अनुभव कराया है, लेकिन परिवार के लिए यह एक अपूरणीय क्षति है। मनीष अपने पिता के सपनों को साकार करते हुए सेना में गए थे। उनकी वीरता और देशभक्ति की कहानियां अब गांव के हर घर में सुनाई जा रही हैं।
शहीद जवान मनीष को अंतिम बिदाई देने उमड़े हजारों लोग
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पार्थिव शरीर के साथ गांव में उमड़ा जनसैलाब
मंगलवार को जब मनीष तिवारी का पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, तो हर तरफ शोक की लहर फैल गई। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सभी उनके घर पर सांत्वना देने के लिए उमड़ पड़े। सेना के जवानों ने सलामी देकर शहीद को अंतिम विदाई दी।