एक जमाना था जब राबडी देवी अपने भाई साधु यादव को टिकट नहीं दिला सकीं तो लालू प्रसाद ने पत्रकारों से बताया- राबडी रूसल बाडी। मांग तानी चोखा त दे ताडी चटनी।
यह बात तब की है जब लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे। पटना में मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग में आने-जाने वालों को लालू प्रसाद बेसाख्ता राबडी देवी की नाराजगी की बात बताते।
लालू प्रसाद ने राबडी की बात अनसुनी कर दी जिस पर वो आहत हो गईं। बाद में लालू प्रसाद ने साधु यादव को सामाजिक योगदान करने वाले कोटे के तहत उच्च सदन यानी विधान परिषद में भेज दिया था।
तब सिर्फ अपने घर को संभालने वाली राबडी देवी को शायद खुद भी पता नहीं था कि समय का पहिया ऐसे घूमेगा कि उन्हें ही मुख्यमंत्री बनना पडेगा। पशुपालन घोटाले में जब लालू अभियुक्त बने तो मुख्यमंत्री की कुर्सी से उन्हें इस्तीफा देना पडा।
वर्ष 1997 में राबडी ने मन मार कर मुख्यमंत्री बनना स्वीकार किया था। साल 2013 में इस बार आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद को चारा घोटाले में पांच साल की सजा के बाद राष्ट्रीय जनता दल की कमान उनके हाथ में होगी। पति और आरजेडी अध्यक्ष के जेल जाने से दुखी राबडी देवी ने कहा - वह आउट नहीं हुई हैं।
राबडी की चुनौतियां
आरजेडी के पास अपने सिर पर आंचल रखने और साधारण दिखने वाली महिला राबडी देवी के सिवा कोई विकल्प नहीं था। लोकसभा चुनाव के पहले बिहार में अपने जनाधार को गोलबंद रखने और पार्टी की एकता को बनाए रखने के लिए यह जरूरी था। उनके दो जवान बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप भी राजनीति में सक्रिय हो गए हैं, लेकिन उनकी मां को ही पार्टी ने सामने रखा है।
पार्टी की कमान संभालने के बाद राबडी के सामने वास्तविक चुनौतियां कम नही हैं। उनके सामने पार्टी के अंदर और बाहर की चुनौतियां हैं। बाहर की चुनौती ये है कि उन्हें नरेंद्र मोदी की भाजपा और नीतीश कुमार के खिलाफ अपने आधारों को संगठित कर उसे अपने वोट बैंक में बदलना है। याद रहे कि राबडी देवी के हाथ में लगातार तीन चुनावों में हारने वाली पार्टी की कमान है। और लालू जेल में हैं।
वहीं पार्टी के अंदर रघुवंश प्रसाद सिंह, अब्दुल बारी सिद्दीकी, प्रभुनाथ सिंह, रामचंद्र पूर्वे, जगदानंद समेत अनेक नेताओं के साथ अपने बेटों को साथ लेकर चलने की चुनौती भी है। ये चुनौती आसान नहीं है। उन्हें दो मोर्चों पर साथ साथ लडना होगा, बिना लालू के।
समय बताएगा कि उन्हें इसमें कितनी कामयाबी मिलती है। हालांकि उनकी पार्टी लालू के जेल जाने के बाद कह रही है कि पार्टी का हर एक कार्यकर्ता लालू है।
'मैं हूं ना'
ये बात सही है कि अब राबडी देवी को राजनीति का पहले से कहीं ज्यादा अनुभव है। जब पहली बार उन्हें मुख्यमंत्री का पद सौंपा गया था तो सरकार चलाना, अधिकारियों के साथ बैठक करना, उन्हें निर्देष देना वगैरह पहाड जैसा काम दिख रहा था। लालू पसाद ने उन्हें समझाया, ‘सब ठीक हो जाएगा। मैं हूं न।’ सीधी-सादी राबडी पहाड जैसी दिखने वाली जिम्मेदारी को ठुकरा न सकीं।
उनके लिए घर में ही ट्यूटर का इंतजाम किया गया। 25 जुलाई 1997 को राबडी देवी सीएम बनीं और उसके 20 दिनों बाद ही 15 अगस्त को गांधी मैदान में भाषण देना था। भाषण का रियाज भी कराया गया।
एक तत्कालीन जिलाधिकारी पीछे से भाषण पढती रहीं और राबडी देवी उसे दुहराती रहीं। लालू प्रसाद के जेल जाने के बाद उनके निर्देषों पर सरकार चलती रही। रिमोट लालू प्रसाद के हाथों में था। जेल से वह बाहर निकले तो मंच या प्रेस कांफ्रेंस में वह आहिस्ता-आहिस्ता बोलते। राबडी उन बातों को दोहरातीं। भला किस महिला को अपने पति पर भरोसा न होगा?
कुछ सालों में ही रियाज का फल दिखने लगा। राबडी अब वैसी नहीं थीं। वह बदल चुकी थीं। विधानसभा से लेकर जनता के बीच उनके भाषण में धारावाहिकता आ गई थी। राबडी देवी तीन बार मुख्यमंत्री बनीं और उन्होंने सात साल चार महीने 46 दिनों तक सत्ता चलाई। एक बार तो गांधी मैदान की सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सामने मंच पर वाजपेयी सरकार पर खूब गरजीं।
लालू यह देख मंद-मंद मुस्कुराते। चेहरे पर गर्व का भाव उभरता। गोया वे बता रहे हों कि देखो हमने लोकतंत्र की कैसी व्याख्या निकाली।
अब लालू प्रसाद जेल में है और चुनाव सामने हैं। अब राबडी ने अपना एजेंडा तय कर दिया है। वे बोलती हैं लालू प्रसाद को फंसाया गया है। पार्टी में कोई टूट नहीं होगी। गांव-गांव में जाएंगे लोगों को लालू जी की बातों को बताएंगे।