कटिहार के एनएच-31 पर शनिवार की शाम जो कुछ भी हुआ, वह महज एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता और मानवीय क्रूरता का जीवंत प्रमाण है। 13 मासूम जिंदगियां एक ऐसे ‘न्याय रथ’ के नीचे कुचल दी गईं, जिसका चालक शराब के नशे में धुत होकर 100 की रफ्तार से मौत का खेल खेल रहा था। यह इनसाइड स्टोरी उन तथ्यों को उजागर करती है, जो बताती है कि कैसे 800 किलोमीटर लंबे सफर में सिस्टम सोता रहा और मासूमों की चीखें हाईवे की हवा में दफन हो गईं।
न्याय रथ का काला अतीत: 2019 का वह अग्निकांड
यह ‘न्याय रथ’ बस सेवा पहले भी मासूमों का लहू पी चुकी है। अगस्त 2019 में पूर्णिया बस स्टैंड के पास इसी सेवा की एक बस डिवाइडर से टकराकर धू-धू कर जल उठी थी। उस वक्त एक महिला की जलकर मौत हुई थी और 17 लोग अपंगता के कगार पर पहुंच गए थे। सात साल बाद भी उसी बस सेवा की लापरवाही ने आज 13 और लोगों को मौत की नींद सुला दिया।
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