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बिहार: दिग्गजों की विरासत की होगी परीक्षा

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लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में बिहार की आधा दर्जन सीटों के लिए होने वाला मतदान जहां नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के सियासी इम्तिहान का पहला पर्चा है, वहीं राज्य के तीन दिग्गज नेताओं की विरासतों की अग्निपरीक्षा भी है।
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लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के सामने राष्ट्रीय दलित राजनीति में बड़े चेहरे अपने पिता बाबू जगजीवन राम की कर्मस्थली सासाराम में उनकी विरासत बचाए रखने की चुनौती है तो बिहार की दलित राजनीति केएक और बड़े नाम रामविलास पासवान के चिराग यानी उनके बेटे चिराग पासवान का जमुई लोकसभा क्षेत्र में पहला सियासी इम्तिहान है।

जबकि बिहार की राजनीति के एक शिखर रहे पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह छोटे साहब के बेटे पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार अपने पिता और महात्मा गांधी को चंपारण ले जाने वाले दादा अनुग्रह नारायण सिंह की विरासत के नाम पर औरंगाबाद में कांग्रेस का झंडा गाडऩे के लिए गांव गांव घूम रहे हैं।
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मीरा कुमार तीसरी बार मैदान में

बिहार में सबसे पहले जिन छह सीटों में मतदान होने जा रहा है, उनमें सासाराम, काराकाट, औरंगाबाद, गया, नवादा और जमुई हैं। सासाराम, गया और जमुई अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं, बाकी तीनों सीटें सामान्य हैं।

सासाराम से लोकसभा अध्यक्ष मीराकुमार कांग्रेस उम्मीदवार हैं जो लगातार तीसरी बार यहां से मैदान में हैं। 2004 और 2009 में वह लगातार जीती हैं। इस बार उनका मुकाबला भाजपा के छेदी पासवान और जद(यू) केके.पी. रमैया से है।

पूर्व सांसद पासवान जद(यू) से दल बदल करके भाजपा केउम्मीदवार बने हैं, वह इसी क्षेत्र की मोहनिया(सु) सीट से विधायक हैं। जबकि रमैया बिहार सरकार केसेवानिवृत्त अधिकारी हैं। मीरा का पद, कद और राजद साथ में बाबू जगजीवन राम की विरासत उनकी ताकत है जो प्रतिद्वंदियों पर भारी है।

जबकि छेदी पासवान को भाजपा समर्थक और कार्यकर्ता हजम तो नहीं कर पा रहे हैं,लेकिन उन्हें नेतृत्व ने समझाया है कि छेदी पासवान मजबूरी है, नरेंद्र मोदी जरूरी है। इसलिए वह छेदी केलिए नहीं मोदी केलिए वोट मांग रहे हैं। उधर रमैया को अपनी सरकार और प्रशासनिक अधिकारी केरूप में किए गए विकास और जन कल्याण केकामों केबदले लोगों के समर्थन का भरोसा है।

चिराग रोशन करने की कोशिश

दूसरी अहम सीट है जमुई। यहां से लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान बिहार की दलित राजनीति में अपने बेटे चिराग को रोशन करने के लिए उन्हें भाजपा केसमर्थन से लोकसभा भिजवाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

पूरा पासवान परिवार यहां डेरा डाले है। युवा चिराग, उनकी साफ सुथरी छवि और फिल्मी कैरियर लोगों को लुभा रहा है। चिराग पहली बार चुनाव मैदान में उतरे हैं। उनके मुकाबले जद(यू) ने अपने दिग्गज विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी को उतारा है।

अति पिछड़ों का समर्थन और मुसलमानों का झुकाव चौधरी का हौसला बढ़ा रहा है। हालाकि इलाके इस क्षेत्र की तीन विधानसभा सीटों पर दबदबा रखने वाले नीतीश सरकार के मंत्री और इलाकेके कद्दावर राजपूत नेता नरेंद्र सिंह की आंख मिचौली चौधरी को उलझन में डाले हुए है। राजद के सुधांशु शेखर भास्कर भी मैदान में हैं और मुकाबले को तिकोना बना रहे हैं।

निखिल कुमार एक बार फिर कांग्रेस उम्मीदवार

तीसरी सीट है औरंगाबाद, जहां से पूर्व राज्यपाल, पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी निखिल कुमार एक बार फिर कांग्रेस उम्मीदवार हैं।

पिता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंन्द्र नारायण सिंह की विरासत, राजद के समर्थन की ताकत और साफ सुथरी छवि उन्हें इस बार मैदान मारने लायक बना रही है।

सजातीय राजपूत वोटों में निखिल जितनी भी सेंधमारी करेंगे उनकी कामयाबी की संभावना बढ़ जाएगी। मुकाबले में यहां से दो बार सांसद रह चुके सुशील कुमार सिंह हैं जो लगातार जद(यू) के टिकट पर जीते, लेकिन चुनाव से पहले भाजपा में आकर अब मोदी लहर पर सवार होकर तीसरी बार लोकसभा में पहुंचना चाहते हैं।

भाजपा का सवर्ण आधार और राजपूत मतदाताओं की एकजुटता उनकी ताकत है, लेकिन इलाके में उनकी अनुपलब्धता की आम शिकायत भी है। जद(यू) ने बागी कुमार वर्मा को मैदान में उतारा है।

अति पिछड़ी दांगी जाति से ताल्लुक रखने वाले बागी गांव गांव घूम कर नीतीश सरकार द्वारा अति पिछड़ों, महादलितों और महिलाओं केसशक्तीकरण केलिए उठाए गए कदमों केबदले वोट मांग रहे हैं। मुसलमानों के वोट केलिए निखिल और बागी दोनों की दावेदारी है।

कमल निशान पर बटन दबाने की अपील

काराकाट लोकसभा सीट पर बेहद दिलचस्प मुकाबला है। भाजपा ने यह सीट अपने सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समाज पार्टी(रालोसपा) के लिए छोड़ी है। यहां से रालोसपा केअध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा अपने पंखा चुनाव निशान पर चुनाव लड़ रहे हैं।

जबकि भाजपा और मोदी केसमर्थक गांव गांव में कमल निशान पर बटन दबाने की अपील के साथ कुशवाहा केलिए वोट मांग रहे हैं। कुशवाहा केलिए सबसे बड़ी चुनौती घर घर अपना चुनाव निशान पहुंचाने की है।

दूसरे भाजपा के मुखर नेता रामेश्वर चौरसिया इसी क्षेत्र की नोखा विधानसभा सीट से विधायक हैं। चौरसिया खुद यहां से लोकसभा चुनाव लडऩा चाहते थे,लेकिन सीट सहयोगी दल को चले जाने की वजह से चौरसिया और उनके समर्थक घर बैठ गए हैं। कुशवाहा के खिलाफ राजद ने पूर्व केंद्रीय मंत्री कांति सिंह को उतारा है।

जबकि जनता दल(यू) से मौजूदा सांसद महाबली सिंह मैदान में हैं। उपेंद्र कुशवाहा जद(यू) से  अलग होकर अपना दल बनाकर एनडीए में आए हैं। वह इस इलाके के रहने वाले नहीं हैं।

राजपूत और कुशवाहा बहुल इलाके में उन्हें अपनी बिरादरी केएक मुश्त समर्थन का भरोसा है और भाजपा के राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण समीकरण से उन्हें खासी उम्मीद है। लेकिन कांति सिंह भी राजपूत हैं और इस क्षेत्र की बहू  हैं। राजपूतों वोटों में सेंध के साथ यादव और मुसलमान मतों के भरोसे वह मजबूती से मैदान में हैं।

डेहरी केपूर्व विधायक प्रदीप जोशी केनिर्दलीय खड़े होने से भी चुनावी गणित प्रभावित हो रहा है। बाहुबली जोशी करीब एक लाख मतों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। उनकी पत्नी ज्यति रश्मी डेहरी से ही निर्दलीय विधायक हैं।

मोदी की लहर में स्थानीय और बाहरी का कोई मुद्दा नहीं

विक्रमगंज चौक पर मिले वकील उमाशंकर सिंह कहते हैं उपेंद्र कुशवाहा नेपाल सीमा केरहने वाले हैं जबकि कांति हमारे इलाके की बहू है।

किन पास ही खड़े राजेश सिंह इसका प्रतिवाद करते हुए कहते मोदी की लहर में स्थानीय और बाहरी का कोई मुद्दा नहीं हैं कि है। नोखा में महेश गुप्ता, अशोक कुमार, जितेंद्र समेत ज्यादातर लोग इस इलाके में कुशवाहा और कांति के मुकाबले की ही बात करते हैं।

नवादा लोकसभा सीट इसलिए चर्चा में हैं कि यहां से भाजपा केवरिष्ठ नेता गिरिराज सिंह को मैदान में उतारा गया है। गिरिराज बेगूसराय से चुनाव लडऩा चाहते थे, लेकिन नेतृत्व ने यहां से पिछली बार जीते भोला सिंह को बेगूसराय भेज दिया और गिरिराज को नवादा से लडऩे को कहा। इससे गिरिराज शुरु में खासे नाराज रहे, लेकिन अब वह पूरी तरह चुनाव संग्राम हैं।

भाजपा-जद(यू) गठंबंधन के दिनों से ही नीतीश कुमार के मुखर विरोधी रहे गिरिराज का चुनाव शुरुआती चरण में कमजोर था, लेकिन नवादा में नरेंद्र मोदी की जनसभा केबाद उनके चुनाव अभियान में गरमी आ गई है।

पिछली बार यहां से भाजपा केभोला सिंह के खिलाफ लोजपा से वीणा देवी लड़ी थी, जो इस बार मुंगेर से लोजपा भाजपा गठबंधन की उम्मीदवार हैं। गिरिराज के मुकाबले में राजद ने अपने पूर्व मंत्री राजवल्लभ यादव और जद(यू) ने कौशल यादव को उतारा है।

कौशल यादव और उनकी पत्नी पूर्णिमा यादव इस लोकसभा सीट की दो विधानसभा सीटों से विधायक हैं। राजद और जद(यू) केबीच यादव और मुस्लिम वोटों का विभाजन और भाजपा के साथ सवर्ण और पासवान वोटों की एकजुटता गिरिराज सिंह को मजबूत बना रही है।
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भाजपा का जोर ज्यादा

गया सीट भी सुरक्षित है। यहां से भाजपा के मौजूदा सांसद हरी मांझी, राजद केरामजी मांझी और जद(यू) के जीतन राम मांझी के बीच त्रिकोणात्मक मुकाबला है।

जीतन राम मांझी राज्य सरकार में अनुसूचित जाति जनजाति मामलों के मंत्री भी हैं। हालाकि गया शहर में भाजपा का जोर ज्यादा दिखता है।

यहां लड़ाई भाजपा और जद(यू) के बीच नजर आती है। शहर केलोग बताते हैं कि इस क्षेत्र में कुम्हार और कायस्थ बिरादरी का वोट खासी तादाद मैं है और भाजपा का इन दोनों वर्गों में जनाधार है।

इसलिए यहां लगातार भाजपा जीतती है। लेकिन देहाती इलाकों में जाते ही राजद की ताकत भी सामने नजर आने लगती है। डोभी, करमौनी, शेरघाटी,वासुदेव नगर,ताराडीह, मुंगराई आदि इलाकों में लड़ाई राजद औरभाजपा केबीच होती दिखती है।

शेरघाटी जो नक्सलियों का गढ़ माना जाता है, में सलीम और शौकत कहते हैं कि पूरा चुनाव जातियों केसमीकरण में उलझ गया है।
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