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बाबूजी के नाम के आसरे मीरा कुमार

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सासाराम फिलहाल वाराणसी, लखनऊ, अमेठी जैसे लोकसभा क्षेत्रों की तरह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में नहीं है।
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लेकिन जब 16 मई को मतगणना होगी तब बिहार की इस लोकसभा सीट पर पूरे देश की नजर रहेगी। पंद्रहवीं लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार यहां से सांसद हैं और एक बार फिर से चुनाव मैदान में भी हैं।

सासाराम लोक सभा क्षेत्र बिहार की उन छह सुरक्षित सीटों में से एक है जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है।

लंबे समय तक कांग्रेस का दलित चेहरा माने जाते रहे दिवंगत नेता जगजीवन राम ने सात बार सासाराम का लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया। उनकी बेटी और लोकसभा की निवर्तमान अध्यक्ष मीरा कुमार पिछले दो चुनावों से यहां का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।
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मुकाबला

सासाराम शहर और आस-पास के गांवों में लोगों से बातचीत से जो राजनीतिक तस्वीर सामने आई उसमें मुख्य रूप से मुकाबला मीरा कुमार और भाजपा उम्मीदवार छेदी पासवान के बीच दिखाई दे रहा है। 2009 के चुनाव में भी मीरा कुमार ने भाजपा उम्मीदवार मुनि लाल को हराया था।

राम सिंहासन प्रसाद पेशे से डाकिया हैं। हर मौसम घर-घर घूमते हैं। इलाके में चुनावी माहौल का बयान करते हुए उन्होंने कहा कि मुकाबला मीरा और मोदी के बीच ही है। साथ ही दोनों ही उम्मीदवारों की जमीनी स्थिति को इन दो नारों के जरिए भी समझा जा सकता है।

'जगजीवन की हीरा है, सासाराम की मीरा है', मीरा कुमार के प्रचार बैनरों में एक नारा यह भी दिखाई देता है। तो दूसरी ओर भाजपा को समर्थक यह जुमला सुनाना नहीं भूलते कि 'छेदी पासवान मजबूरी है, नरेंद्र मोदी जरूरी हैं।'

दरअसल आज मीरा कमार का कद और राजनीतिक व्यक्तित्व देश-दुनिया में चाहे जितना ही बडा हो, क्षेत्र में आज भी वह अपने पिता की राजनीतिक विरासत के सहारे ही चुनाव लडती हैं।

'सशर्त' समर्थन

जैसा कि मोर गांव के हरिहर राम बताते हैं कि वे कांग्रेस के समर्थक हैं और मीरा कुमार को वोट देंगे। क्यों देंगे, इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि यह क्षेत्र उनके (मीरा कुमार के) बाबूजी का है और उन्होंने विकास के कई काम किए थे।

वहीं दूसरी ओर छेदी पासवान का समर्थन क्षेत्र के लोग नरेंद्र मोदी के लहर के प्रभाव में कर रहे हैं। चुनाव के पहले दल बदलने की छवि रखने वाले छेदी पासवान ने ठीक चुनावों के पहले जदयू छोडकर भाजपा का दामन थामा है।

छेदी पासवान को मिल रहे 'सशर्त' समर्थन के बारे में सराय गांव के जयराम पासवान बताते हैं कि छेदी अब-तक पांच-छह दल बदल चुके हैं, इस कारण वे मजबूरी हैं और नरेंद्र मोदी की पूरे देश में लहर है, इस कारण वे जरूरी हैं।

तीसरा कोण

सोलहवीं लोकसभा के चुनाव बिहार में इस मायने में खास हैं कि पहली बार सूबे में हर सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला है। हर क्षेत्र में एनडीए, यूपीए और तीसरे मोर्चे के प्रत्याशियों की दमदार उपस्थिति दिखाई दे रही है। गौरतलब है कि बिहार में सत्तारुढ जदयू, भाकपा और माकपा तीसरे मोर्चे में शामिल हैं।

यहां से पूर्व आईएएस अधिकारी केपी रमय्या को जदयू ने अपना उम्मीदवार बनाया है। राज्य सरकार के कामकाज के नाम पर जदयू अपने उम्मीदवार के लिए वोट मांग रही है। इनमें महादलित मिशन के तहत किए गए काम भी प्रमुख हैं।

गौरतलब है कि रमय्या नीतीश कुमार सरकार के महत्वाकांक्षी योजना महादलित मिशन को आकार देने वाले प्रमुख नौकरशाह माने जाते हैं। चुनावों के ठीक पहले उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी।

महादलित, अतिपिछडों के समर्थन के साथ-साथ नरेंद्र मोदी के विरोध में होने वाली गोलबंदी में अगर क्षेत्र की जनता ने जदयू की जीत की संभावना देखी तो सासाराम के चुनाव परिणाम चौंकाने वाले भी हो सकते हैं।

बसपा का आधार

सासाराम की बात करें तो यहां ऊपर के तीनों गठबंधन के अलावा बहुजन समाज पार्टी यानी की बसपा का भी अच्छा आधार है। उत्तर प्रदेश से सटे इस लोकसभा क्षेत्र में बसपा का अपना परंपरागत आधार वर्ग है।

2009 के आम-चुनाव में यहां बसपा उम्मीदवार गांधी आजाद को लगभग एक लाख मत मिले थे। लेकिन इस बार प्रत्याशियों को लेकर हुई उठापटक के कारण बसपा का दावा थोडा कमजोर दिखाई दे रहा है।

बसपा ने मीरा कुमार को कडी टक्कर देने के उद्देश्य से अंतिम समय में उनकी भतीजी मेधावी कीर्ति को अपना उम्मीदवार घोषित किया था। लेकिन जांच के दौरान उनका नामांकन त्रुटिपूर्ण पाया गया और वह मुकाबले से बाहर हो गईं।

गठबंधन

कुसुढी गांव के रामनाथ पासवान ने बताया कि 2009 में उन्होंने राजद गठबंधन को वोट दिया था लेकिन इस बार रामविलास पासवान की पार्टी का भाजपा से गठबंधन है तो वो भाजपा को वोट देंगे।

वहीं सासाराम से लगभग पांच कलोमीटर की दूरी पर बसे मुरादाबाद के इबरार अहमद ने बताया कि उन्होंने पिछले बार लालू यादव की पार्टी को वोट दिया था लेकिन इस बार लालू ने कांग्रेस से गठबंधन किया है तो इस बार वह मीरा कुमार को वोट देंगे।

नाराजगी
जगजीवन राम की छवि और दूसरे राजनीतिक समीकरणों के कारण मीरा कुमार को क्षेत्र के संपन्न वर्ग के लोगों का समर्थन अब तक मिलता रहा है। लेकिन यह तबका इस बार उनके प्रति नाराज दिखाई दे रहा है।

पिछले साल सासाराम शहर से लगभग बीस किलोमीटर की दूरी पर बसे बड्डी गांव में स्वतंत्रता दिवस के दिन झंडा फहराने को लेकर हुए विवाद में एक दलित की मौत हो गई थी और दर्जनों घायल हुए थे। घटना में मुख्यतः राजपूत जाति के लोग शामिल बताए जाते हैं।

घटना के बाद मीरा कुमार ने 'दबंग वर्ग' के लोगों की आलोचना की थी। इसके बाद से ही उनके प्रति क्षेत्र में ऊंची जातियों के बीच नाराजगी है और चुनाव के बहाने वे अपनी नाराजगी को प्रकट करने का मौका भी तलाश कर रहे हैं।

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जीत और जवाब

दूसरी ओर क्षेत्र में पहाड उत्खनन पर लगी रोक भी एक मुद्दा है। जिस वक्त रोक लगी थी, जदयू उम्मीदवार राज्य के खनन सचिव थे। क्षेत्र में लगभग 40,000 परिवारों की आजीविका इस कारोबार से चलती है। ऐसे में इस काम में लगे मजदूरों को जदयू के खिलाफ भडकाया भी जा रहा है।

साल 1986 में जगजीवन राम की मौत के बाद भी मीरा कुमार ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए 1989 के आम चुनाव में सासाराम से चुनाव लडा था। लेकिन लगातार 1989 और 1991 के आम चुनावों में उन्हें छेदी पासवान के हाथों हार का सामना करना पडा था।

एक बार फिर इस क्षेत्र में यही दोनों उम्मीदवार मुख्य मुकाबले में दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मीरा अपनी सीट बरकरार रखते हुए दो दशक पहले की दो हारों का हिसाब-किताब बराबर कर पाएंगी।
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