बिहार में एक नए हंगामे की जमीन तैयार हो गई है। यह हंगामा पूरी आबादी को परेशान करेगा। फिलहाल पटना से इसकी शुरुआत हो चुकी है। दशकों से सोया पटना नगर निगम जागा तो आम लोगों को उसने नोटिस थमाना शुरू कर दिया। अपनी गलती देखे बगैर। गिरेबां में झांके बगैर। लोग परेशान हुए। जन-प्रतिनिधियों को पकड़ा। वह भी नहीं समझ सके। 'अमर उजाला' इस खबर पर काम कर रही रहा था कि जन-प्रतिनिधियों का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री से मिला और तत्काल उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति का गठन कर दिया गया। लेकिन, सवाल बड़ा है। क्या आवासीय क्षेत्र में कॉमर्शियल कामकाज कर रहे 5798 संगठन, संस्था, कार्यालय, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, कोचिंग, दुकान, मोबाइल टावर... सब हट जाएंगे? हटे तो कहां जाएंगे? नहीं तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश का क्या होगा? और, सबसे बड़ी बात कि क्या अपनी गलती को नगर निगम छिपा लेगा?
पहले जानिए कि समस्या क्या है?
समस्या सामने तब आई, जब सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के तहत पटना नगर निगम ने आवासीय क्षेत्र के 5798 मकान-भवन मालिकों को नोटिस थमा दिया। लिखा गया कि सर्वोच्च न्यायालय की ओर से Miscellaneous Application Diary No(s).17103/2026 in SLP(c) Nos.8044-8045/2025 में पारित आदेश (दिनांक–25.03.2026, दिनांक–20.05.2026, 09.07.2026 एवं 05.08.2026) के अनुपालन के लिए पटना नगर निगम के क्षेत्र अंतर्गत आवासीय क्षेत्र में गैर-आवासीय उपयोग से संबंधित सर्वेक्षण का कार्य निगम के सभी अंचलों में वार्डवार किया गया है। नगर निगम ने इसे 'अनधिकृत' बताते हुए 5798 मकान-भवन मालिकों को नोटिस थमाया। यानी, नगर निगम के अनुसार इतने जमीन मालिकों, मकान मालिकों और बिल्डर-डेवलपर्स ने आवासीय क्षेत्र में गैर आवासीय यूनिट चलाने की गलती की है। अनधिकृत रूप से।
समस्या की जड़ है नगर निगम
यह समस्या अभी तो सिर्फ पटना नगर निगम के दायरे में सामने आई है, हालांकि राज्य के सभी नगर निकायों में यही स्थिति सामने आएगी। पटना को ही ले लें तो नगर विकास एवं आवास विभाग से लेकर पटना नगर निगम तक 'कुंभकर्णी निद्रा' में सोया हुआ नहीं था, बल्कि भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा के कारण सबकुछ देखकर भी अनदेखा कर रहा था। पिछली शताब्दी तक पटना नगर निगम की ओर से रिहायशी इलाकों में वाणिज्यिक गतिविधियों पर टोकाटाकी होती थी, लेकिन इस बहाने सीधी वसूली होकर रह जाती थी। इस सदी के इन साढ़े 25 वर्षों में सबकुछ की छूट मिलती रही। अगर नहीं तो बगैर कॉमर्शियल लाइसेंस के क्या 5798 यूनिट्स काम करते? छोटी दुकानों को छोड़िए, 10 हजार वर्गफीट तक के 88 गोदाम चलते? या, 167 गेस्ट हाउस या, 34 नर्सिंग होम या 69 विवाह भवन या 294 पार्किंग या 266 स्कूल, 349 हॉस्टल, 54 होटल चलते? पटना के रिहायशी इलाकों में यह सब चल रहे हैं। 54 उद्योग भी, जिनका लाइसेंस कितने कार्यालयों से घूमने के बाद बन पाता है। सभी की शुरुआत पटना नगर निगम से होती है। मतलब साफ है कि पटना नगर निगम के आयुक्त से लेकर हर स्तर के अधिकारी-कर्मचारी लंबे समय से सबकुछ आंखें खोलकर होने दे रहे हैं। और, अब सुप्रीम कोर्ट के नाम सुनवाई का बहाना भी उनके 'काम' ही आएगा।
क्षेत्र निर्धारण, नक्शा... हर जगह खेल
सबसे पहली बात कि जिस तरह से 5798 मकान-भवन मालिकों को नोटिस देकर सुनवाई की तारीखें दी गई हैं, उससे साफ होता है कि पटना में हर तरफ रिहायशी ही इलाका है। बेली रोड और अशोक राजपथ के कुछ हिस्सों को छोड़ सब रिहायशी इलाका है। क्या यह रुचने-पचने लायक बात हो सकती है? कोई भी इसे स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन, क्षेत्र निर्धारण से छेड़छाड़ नहीं करते हुए सभी को रिहायशी इलाका रखा गया। फिर इसमें हर काम के लिए आगे क्या हो रहा होता है, यह समझना मुश्किल नहीं। रिहायशी इलाके में कॉमर्शियल ले-आउट की बिल्डिंग बन रही हो तो उसका नक्शा कैसे पास होगा, यह समझना मुश्किल नहीं। न ही यह समझना मुश्किल है कि रिहायशी इलाके में कॉमर्शियल काम का लाइसेंस या मोबाइल टावर लगाने की छूट कैसे मिलती होगी। इसी तरह यह समझना भी मुश्किल नहीं कि पटना नगर निगम के अंदर रिहायशी इलाके में कर-निर्धारण करते समय क्या खेल चल रहा होगा। और, न ही यह समझना मुश्किल है कि रिहायशी घोषित इलाकों में पानी-बिजली-कचरा निस्तारण जैसी सुविधा देने वाला सिस्टम किस तरह का खेल कर रहा होगा।
नोटिस के साथ बढ़ती गई बात
पटना नगर निगम ने शहर के प्रख्यात चिकित्सकों, शिक्षाविदों, कानूनविदों के साथ बड़े शोरूम, स्कूल, स्टोर्स, रिसर्च इंस्टीट्यूट्स, कोचिंग्स, हॉस्पिटल, डिस्पेंसरी, नर्सिंग होम से लेकर धार्मिक स्थल तक को 'अनधिकृत गैर-आवासीय गतिविधि' का नोटिस जारी किया। ऐसा नोटिस पाने वालों ने 'अमर उजाला' से संपर्क किया तो हमने विस्तार से इसपर काम किया। सामने आया कि तीन दर्जन से ज्यादा श्रेणियों के भू-स्वामियों या भवन मालिकों को नोटिस तामिला कराया गया है। नोटिस की हालत यह रही कि रिहायशी इलाकों में गैर-आवासीय गतिविधि के लिए एक नोटिस 'Residential' श्रेणी के तहत भी दिया गया है। इसी तरह एक नोटिस धर्म स्थल को भी दिया गया है। सरकारी कार्यालय चलाने पर भी और पेट्रोल पंप पर भी। नोटिस पाने वालों में सबसे ज्यादा 1820 की संख्या दुकानों की है। सभी तरह की श्रेणियों को बांटने के बाद 'Others' के नाम पर भी 1733 नोटिस जारी किए गए हैं। ऐसे नोटिस पाने वाले परेशान हैं, इसलिए मीडिया से लेकर जन-प्रतिनिधियों तक का दरवाजा खटखटाया गया।
नोटिस पर नहीं आना मतलब- आप गलत हैं
जिन 5798 भू-स्वामी, मकान-भवन मालिकों को यह नोटिस दिया गया, उनके लिए हर निगम अंचल के हिसाब से तीन अलग तारीखें मुकर्रर की गईं। पटना में पाटलिपुत्रा, नूतन राजधानी, कंकड़बाग, बांकीपुर, अजीमाबाद और पटना सिटी अंचल के लिए तीन-तीन तारीखें दी गईं। सभी अंचलों में एक-एक तारीख की सुनवाई हो गई, तब जाकर जन-प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की। मुलाकात में यह भी बताया गया कि कैसे हर इलाके को रिहायशी बताते हुए गैर-आवासीय कामकाज का नोटिस थमाया गया है। सभी नोटिस में स्पष्ट लिखा गया है कि निर्धारित तिथि एवं समय पर उपस्थित होकर अपना पक्ष रखें और अगर अनुपस्थित रहने की स्थिति में यह माना जाएगा कि आपको अपने पक्ष में कुछ नहीं कहना है।
ऐसी स्थिति में उपलब्ध साक्ष्य/सर्वेक्षण के आधार पर अंतिम आदेश पारित किया जाएगा। मतलब, कार्रवाई। सभी से 1. गैर आवासीय उपयोग हेतु अनापत्ति का साक्ष्य/दस्तावेज, 2. प्रश्नगत स्थल का भू-स्वामित्व दस्तावेज, 3. स्वीकृत नक्शा (Sanctioned plan) और 4. अधिभोग प्रमाण-पत्र (Occupancy certificate) मांगा गया है। निश्चित तौर पर दुकान जैसी छोटी इकाइयों या अंदरूनी इलाकों में चल रहे गोदामों के पास बहुत सारे कागजात न हों, लेकिन बाकी के पास हैं भी तो उससे नगर निगम की कार्यशैली का ही खुलासा होगा। और, अगर नोटिस पर नहीं गए तो आप गलत हैं।