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Bihar: बाबा मणिराम अखाड़े में आज से मेले का भव्य का आगाज, देश का इकलौता दरबार जहां प्रसाद में चढ़ता है 'लंगोट'

Wed, 29 Jul 2026 08:14 AM IST
पटना ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नालंदा

सार

नालंदा के बिहारशरीफ स्थित ऐतिहासिक बाबा मणिराम अखाड़े में आज से आठ दिवसीय लंगोट अर्पण मेले की शुरुआत हो रही है। देश के इस अनूठे धार्मिक स्थल पर प्रसाद के रूप में लंगोट अर्पित करने की परंपरा है। मेले में हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। प्रशासन ने सुरक्षा, चिकित्सा, बिजली, पानी और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के व्यापक इंतजाम किए हैं।
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बाबा मणिराम अखाड़ा - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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नालंदा जिले के बिहारशरीफ में पंचाने नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक बाबा मणिराम अखाड़ा एक बार फिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का गवाह बनने जा रहा है। यह देश का संभवतः इकलौता ऐसा धार्मिक स्थल है, जहां भगवान को प्रसाद के रूप में 'लंगोट' अर्पित किया जाता है। सदियों से तप और अखाड़ा परंपरा के इस प्रमुख केंद्र में आज से भव्य आठ दिवसीय लंगोट अर्पण मेले की शुरुआत हो रही है। इस अनूठे दरबार की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के प्रधानमंत्री सहित कई विशिष्ट हस्तियां यहां मत्था टेक चुकी हैं।
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अयोध्या से आकर ली थी जीवित समाधि
मान्यता है कि महान संत, सिद्ध योगी और विख्यात पहलवान बाबा मणिराम 1238 ई. में अयोध्या से नालंदा आए थे। उन्होंने पंचाने नदी के तट पर स्थित पिस्ता घाट को अपनी तपोस्थली बनाया। जीवनभर लोगों को मल्ल युद्ध (कुश्ती) का प्रशिक्षण देने वाले बाबा ने हमेशा संयम, शारीरिक साधना और आध्यात्मिक जीवन का संदेश दिया। वर्षों की कठोर साधना के बाद 1300 ई. में उन्होंने यहीं जीवित समाधि ले ली थी। जनश्रुति है कि बाबा की तपस्या में इतनी शक्ति थी कि एक बार वे जिस दीवार पर बैठकर दातून कर रहे थे, उनके आदेश पर वह दीवार ही चलने लगी थी। यह चमत्कार आज भी बाबा मणिराम की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है।

प्रशासन और पुलिस की होती है अनूठी भागीदारी
इस ऐतिहासिक मेले की सबसे बड़ी खासियत यहां की प्रशासनिक परंपरा है, जो धार्मिक आस्था और प्रशासनिक सम्मान का एक दुर्लभ संगम प्रस्तुत करती है। मेले के उद्घाटन के अवसर पर सबसे पहला लंगोट जिला प्रशासन की ओर से पूरे विधि-विधान के साथ चढ़ाया जाता है। इसके तुरंत बाद पुलिस बल के जवान पूरे सम्मान के साथ अपने शस्त्रों से बाबा को सलामी देते हैं।
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मन्नत पूरी होने पर 1952 में शुरू हुआ था मेला
यूं तो बाबा को लंगोट अर्पित करने की यह परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन इसे वर्तमान मेले का स्वरूप 1952 में मिला। उस समय के तत्कालीन उत्पाद निरीक्षक कपिलदेव प्रसाद ने बाबा से पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी थी। मन्नत पूरी होने पर उन्होंने काशी से विद्वान पंडितों को बुलाकर आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) के दिन विशेष पूजा-अर्चना कराई और इस मेले की नींव रखी। शुरुआत में यह मेला पांच दिनों तक चलता था, लेकिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और बढ़ती आस्था को देखते हुए इसे आठ दिवसीय कर दिया गया।

चाक-चौबंद सुरक्षा और भव्य तैयारियां
इस वर्ष मेले को और अधिक भव्य और आकर्षक बनाने के लिए प्रशासन और न्यास समिति ने पूरी तैयारी कर ली है। बाबा मणिराम अखाड़ा न्यास समिति द्वारा दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए विशाल वाटरप्रूफ पंडाल का निर्माण कराया गया है, जहां चौबीसों घंटे बिजली और पानी की सुविधा उपलब्ध रहेगी। सुरक्षा के मद्देनजर चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए मेडिकल कैंप और विशेष चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध रहेगी। इसके अलावा बच्चों के लिए झूले, महिलाओं के लिए विशेष स्टॉल और खान-पान की दुकानें भी सजकर तैयार हैं।

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बाबा मणिराम अखाड़ा न्यास परिषद के सचिव अमरकांत भारती ने बताया कि जिनकी भी मन्नत पूरी होती है, वे हर वर्ष बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने और लंगोट चढ़ाने आते हैं। मेले की सुरक्षा और सुगमता को लेकर हाल ही में जिलाधिकारी उदिता सिंह और पुलिस अधीक्षक भारत सोनी ने भी मेला परिसर का सघन निरीक्षण कर अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए थे।
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