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Bihar: नालंदा साहित्य महोत्सव 2025 में पहुंचे राज्यपाल-शशि थरूर, भारतीय साहित्य और भाषाई विविधता पर कही ये बात

Sun, 21 Dec 2025 03:59 PM IST
पटना ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला,नालंदा

सार

नालंदा साहित्य महोत्सव 2025 के उद्घाटन सत्र में बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भारतीय ज्ञान परंपरा को भारतीय सभ्यता की निरंतरता का आधार बताया।
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नालंदा साहित्य महोत्सव 2025 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नालंदा साहित्य महोत्सव 2025 के उद्घाटन सत्र में बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि यही वह विशेषता है, जिसने भारतीय सभ्यता को हजारों वर्षों से निरंतर और जीवंत बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा समय के साथ नष्ट नहीं हुई, बल्कि सतत प्रवाह में आगे बढ़ती रही।
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अपने संबोधन में राज्यपाल ने एक प्राचीन संस्कृत श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा, “संसार विष वृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे। काव्य अमृत रसास्वादः सल्लापा सज्जनैः सहा।” उन्होंने कहा कि यह संसार विष वृक्ष के समान है, लेकिन इसके दो अमृत फल हैं—साहित्य और सज्जनों का संग। उपनिषदों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य, कला, नृत्य और संगीत का वास्तविक उद्देश्य मानव को परम सत्य के निकट ले जाना है।

भारतीय सभ्यता की निरंतरता का रहस्य

राज्यपाल ने अल्लामा इकबाल की प्रसिद्ध पंक्तियों, 'यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहां से, बाकी मगर है अब तक नामो-निशां हमारा' का हवाला देते हुए कहा कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इस निरंतरता का रहस्य उजागर किया है। उन्होंने टैगोर के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा कि भारत ने विषम परिस्थितियों में भी उन जीवंत शब्दों को सुरक्षित रखा, जो उसके बच्चों की आलोकित चेतना से उत्पन्न हुए थे।
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मैसूर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. बी.एन. श्री के कथन, 'भारत चिर पुरातन है, लेकिन कभी पुराना नहीं होता' का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि यह तभी संभव है, जब ज्ञान की अविरल और निर्मल धारा निरंतर बहती रहे। भारतीय दर्शन में विद्या के दो स्वरूपों—अपरा विद्या और परा विद्या—का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भौतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और यहां तक कि वेद-उपनिषद भी अपरा विद्या की श्रेणी में आते हैं। परा विद्या वह है, जो आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है। श्रीमद्भगवद्गीता का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि जब मनुष्य सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को देखने लगता है, तो वह मोह से मुक्त हो जाता है और समस्त सृष्टि को अपना ही विस्तार मानने लगता है।

विविधता में एकता का संदेश

स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि भारतीय परंपरा केवल सहिष्णुता तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मान और स्वीकार की भावना को आगे बढ़ाती है। उन्होंने कहा कि भारत ने कभी रंग, भाषा या धर्म के आधार पर किसी प्रकार की श्रेष्ठता का दावा नहीं किया। राज्यपाल ने कहा कि यदि आज विश्व में युद्ध, रक्तपात और घृणा का माहौल है, तो इसके लिए कुछ हद तक भारतीय भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि वे अपने संदेश को विश्व तक सही तरीके से नहीं पहुंचा सके। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने विश्व को बुद्ध दिया है, युद्ध नहीं।

उन्होंने 1948 में मानवाधिकारों की घोषणा का जिक्र करते हुए कहा कि जिस सिद्धांत को विश्व ने 1948 में स्वीकार किया, भारत ने उसे 5000 वर्ष पहले ही “अहम् ब्रह्मास्मि” और “तत्त्वमसि” के माध्यम से स्थापित कर दिया था, जिसमें हर मनुष्य को संभावित रूप से दिव्य माना गया है।

साहित्यकारों से आह्वान

अपने संबोधन के अंत में राज्यपाल ने लेखकों, कवियों और कलाकारों से आह्वान किया कि वे ऐसा वातावरण तैयार करें, जिससे नई चेतना का उदय हो, दूसरों के प्रति सम्मान बढ़े और शांति, सह-अस्तित्व व समृद्धि सुनिश्चित हो सके। कार्यक्रम का समापन “लोका समस्ता सुखिनो भवंतु” और “जय हिंद” के उद्घोष के साथ हुआ।

विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति

इस साहित्यिक आयोजन में सांसद डॉ. सोनल मानसिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद डॉ. शशि थरूर, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के सचिव चंचल कुमार, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह, महोत्सव की अध्यक्ष श्रीमती दिया आलिया सहित देश-विदेश से आए अनेक गणमान्य अतिथि मौजूद रहे। ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, स्वीडन, वियतनाम, श्रीलंका और जापान से आए बौद्ध भिक्षुओं ने भी कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

शशि थरूर ने कही ये बात

नालंदा साहित्य महोत्सव 2025 के उद्घाटन सत्र में कांग्रेस सांसद और प्रसिद्ध लेखक शशि थरूर ने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की गौरवशाली परंपरा को याद करते हुए साहित्य और भाषाई विविधता के महत्व पर जोर दिया। राजगीर की पावन धरती पर आयोजित इस आयोजन में थरूर ने कहा कि नालंदा केवल इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि सदियों से ज्ञान की अनुशासित खोज का प्रतीक रहा है। उन्होंने कहा कि नालंदा का अर्थ है—ज्ञान बांटने वाला, सदैव ज्ञान देने वाला—और यह नाम उस महान केंद्र के लिए पूरी तरह उपयुक्त था, जहां सीखने और ज्ञान साझा करने की प्रक्रिया कभी रुकी नहीं।

नालंदा की गौरवशाली विरासत

थरूर ने कहा कि दुनिया के पहले आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में नालंदा केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि बौद्धिक विमर्श का एक जीवंत अखाड़ा था। यहां ज्ञान निष्क्रिय नहीं रहा, बल्कि उस पर प्रश्न उठाए गए, बहस हुई, उसे परिष्कृत किया गया और आगे बढ़ाया गया।
उन्होंने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय अपने पहले 800 वर्षों में तीन बार नष्ट हुआ और दो बार पुनर्निर्मित किया गया। उन्होंने आशा जताई कि यह तीसरा पुनर्निर्माण स्थायी सिद्ध होगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए फलता-फूलता रहेगा।

साहित्यिक विविधता का उत्सव

थरूर ने कहा कि यह महोत्सव भारत की असाधारण भाषाई बहुलता का उत्सव है। संस्कृत और संथाली, मैथिली और मणिपुरी सहित अनगिनत भाषाएं—जिनमें उनकी अपनी मलयालम भी शामिल है—एक ऐसी सांस्कृतिक बुनावट रचती हैं, जो प्राचीन भी है और निरंतर नवीनीकृत भी।
उन्होंने कहा कि बिहार और पूर्वोत्तर भारत की आवाजों को मंच देकर यह महोत्सव उन परंपराओं को दृश्यता प्रदान करता है, जिन्हें अक्सर साहित्यिक विमर्श के हाशिये पर रखा जाता रहा है।

साहित्य महोत्सवों का महत्व

प्रख्यात लेखक ने कहा कि साहित्यिक महोत्सव इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये साहित्य के अनुभव को लोकतांत्रिक बनाते हैं। ये साहित्य को एकांत से निकालकर संवाद के केंद्र में लाते हैं, जहां उसका वास्तविक स्थान है। लेखक और पाठकों के बीच विचारों के आदान-प्रदान का मंच बनाकर ये महोत्सव साहित्य के सामाजिक जीवन को नया आयाम देते हैं।
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युवाओं की भागीदारी

थरूर ने महोत्सव में युवाओं की सक्रिय भागीदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि आयोजन और क्रियान्वयन की प्रक्रिया में युवाओं को सीखने, परिश्रम करने और नेतृत्व करने के अवसर मिले हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ हुई अपनी संवादात्मक बैठक का उल्लेख करते हुए कहा कि युवाओं की सहभागिता यह सुनिश्चित करती है कि यह महोत्सव केवल स्मारक न रहकर एक प्रेरक शक्ति बने। नालंदा की अंतरविषयक परंपरा को याद करते हुए थरूर ने कहा कि यहां साहित्य कभी अलगाव में नहीं पनपा। यह केवल मानविकी या धर्म का एकांत आश्रय नहीं था। नालंदा में साहित्य विज्ञान से संवाद करता था, दर्शन गणित से मिलता था और कल्पना जिज्ञासा के साथ और अधिक तीक्ष्ण होती थी।
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