बिहार में शराब के सिंडिकेट को रोकने में बिहार सरकार पूरी तरह से असफल साबित हो रही है । यहां ‘मौत की शराब’ में नाचती सियासत है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि अधिकांश लोग शराबबंदी के पक्ष में हैं। लेकिन कुछ लोग गड़बड़ कर रहे हैं। कुछ लोग बाएं दाएं करने की कोशिश कर रहे हैं।
आगे कहा कि अब तो नीतीश सरकार की सहयोगी वीआईपी और हम के अध्यक्षों ने भी मुजफ्फरपुर में शराब पीने से पांच लोगों की हुई मौत पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। नीतीश सरकार के मंत्री मुकेश साहनी ने तो शराबबंदी कानून को ही विफल करार दिया।
बिहार में शराबबंदी कानून को लागू करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लगातार शराबबंदी को लेकर फजीहत हो रही है। शराबबंदी से बिहार सरकार को हर साल सात हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान है।
हम पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा है कि जिन जिलों में शराब की वजह से लोगों की मौत हो रही है वहां के एसपी के ऊपर हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। मांझी ने नीतीश सरकार के शराबबंदी कानून पर सवाल खडे़ करते हुए कहा कि यह सोचने वाली बात है कि जब राज्य में शराबबंदी कानून लागू है तो आखिर शराब बेची कैसे जा रही है।
बिहार में महाराष्ट्र से ज्यादा शराब का सेवन
साल 2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी लागू कर दी थी, जिसके बाद से यह ड्राई स्टेट बन गया था। उस समय बिहार सरकार को तकरीबन 3300 करोड़ के आस-पास राजस्व की हानि हुई थी। लेकिन जमीनी स्तर पर क्या ये शराबबंदी लागू हो पाई। ये बड़ा सवाल है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में महाराष्ट्र से ज्यादा शराब पी जाती है।
सर्वे के मुताबिक बिहार में 15.5 फीसदी पुरुषों ने शराब पीने की बात स्वीकार की है। शहर की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की खपत अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में 15.8 फीसदी लोग शराब पीते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 14 फीसदी था।
वहीं महाराष्ट्र, जहां शराबबंदी लागू नहीं है, में 13.9 फीसदी पुरुष शराब का सेवन करते हैं। महाराष्ट्र के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में शराब की खपत का अनुपात बिहार की तुलना में कम है।