Bihar: नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को एक बड़ा झटका लगा है। उनकी सुरक्षा के स्तर को कम कर दिया गया, जबकि जदयू और भाजपा के कुछ नेताओं का बढ़ा दिया गया। 2 फरवरी से विधान मंडल में सत्र शुरू हो रहा है, इसलिए मुमकिन है कि इस मामले को भी विपक्ष मुद्दा बनाए।
बिहार की नीतीश सरकार ने राज्य के कई दिग्गज विधायकों की सुरक्षा श्रेणी में बड़ा बदलाव किया है। राज्य स्तरीय सुरक्षा समीक्षा समिति की ताजा रिपोर्ट और खुफिया इनपुट्स के आधार पर लिए गए इस फैसले में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव को बड़ा झटका लगा है। सरकार ने तेजस्वी की सुरक्षा घटा दी है, वहीं भाजपा और केंद्र सरकार के कई मंत्रियों का सुरक्षा घेरा पहले से अधिक मजबूत कर दिया गया है।
तेजस्वी से छिनी Z श्रेणी की सुरक्षा, अब Y+ कवर
सुरक्षा समिति की सिफारिश के बाद बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की सुरक्षा कम कर दी गई है। अब तक उन्हें 'Z' श्रेणी की सुरक्षा दी जा रही थी, जिसे घटाकर अब 'Y+' कर दिया गया है। इसके साथ ही तीन अन्य वरिष्ठ नेताओं मदन मोहन झा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी और राजेश राम की सुरक्षा पूरी तरह से वापस ले ली गई है।
कई दिग्गजों का बढ़ा कद, मिली Z सिक्योरिटी
एक ओर जहाँ विपक्ष की सुरक्षा में कटौती हुई है, वहीं सत्ता पक्ष के कई रसूखदार चेहरों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं और बिहार सरकार के मंत्रियों को अब और भी कड़े सुरक्षा घेरे में रखा जाएगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह, स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को अब जेड श्रेणी की सुरक्षा दी गई है। इन्हें वाई से बढ़ाकर वाई प्लस और फिर सुरक्षा मानकों के अनुरूप अपग्रेड किया गया है।
जानिए क्या होता है जेड और वाई प्लस सुरक्षा में अंतर?
जेड श्रेणी के तहत 22 सुरक्षाकर्मी दिए जाते हैं। इसमें 4 से 5 एनएसजी कमांडो के साथ दिल्ली पुलिस, आईटीबीपी या सीआरपीएफ के जवान और स्थानीय पुलिस शामिल होती है। वहीं वाई प्लस श्रेणी के तहत 11 सुरक्षाकर्मी दिए जाते हैं। इसमें 1 या 2 कमांडो के साथ 2 निजी सुरक्षा अधिकारी और अन्य जवान तैनात होते हैं।
क्यों लिया गया फैसला?
इस संबंध में गृह विभाग का कहना है कि यह बदलाव किसी राजनीतिक द्वेष के कारण नहीं बल्कि खतरे के आकलन के आधार पर किया गया है। समिति हर कुछ महीनों में विधायकों और मंत्रियों को मिलने वाली सुरक्षा की समीक्षा करती है और इसी आधार पर सुरक्षा बढ़ाने या घटाने का निर्णय लिया जाता है।