विशेष सचिव मुकेश कुमार लाल की ओर से जारी 11 कीपत्र के अनुसार, वित्तीय वर्ष के अंतिम महीनों विशेषकर फरवरी और मार्च में कोषागारों में बड़ी संख्या में बिल प्रस्तुत किए जाते हैं। इनमें आकस्मिक व्यय और अन्य मदों से संबंधित भुगतान भी शामिल रहते हैं। इससे अंतिम समय में बिलों की जांच और पारित करने में कठिनाई होती है तथा सॉफ्टवेयर सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव बनता है।
वित्त विभाग ने बिहार कोषागार संहिता, 2011 के नियम 176 और 177 का हवाला देते हुए कहा है कि बजट में उपबंधित राशि की निकासी आवश्यकता के अनुसार और वित्तीय अनुशासन के तहत ही की जानी चाहिए। अनावश्यक या अंतिम समय में बड़ी राशि की निकासी से बचने पर जोर दिया गया है। वित्त विभाग ने सभी अपर मुख्य सचिव, प्रधान सचिव, सचिव, विभागाध्यक्ष, प्रमंडलीय आयुक्त, जिलाधिकारी, कोषागार पदाधिकारी और निकासी एवं व्ययन पदाधिकारियों को निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराने को कहा है।
पहले भी दिए गए थे निर्देश?
अधिकारियों की मानें तो ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए पहले भी वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन अब यह पाया गया है कि कोषागारों में बड़ी संख्या में बिल प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिससे जांच में कठिनाई आ रही है। इसी को देखते हुए निर्णय लिया गया है कि 10 मार्च, 2026 तक प्राथमिकता के आधार पर केवल वेतन और पेंशन से जुड़े भुगतान ही पारित किए जाएंगे। इसके बाद अन्य बिलों की नियमानुसार जांच कर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
जानिए विपक्ष ने क्या क्या आरोप लगाया?
बिहार विधान परिषद के सदस्य और राजद नेता सुनील सिंह ने आरोप लगाया कि बिहार सरकार का खजाना पूरी तरह से खाली हो गया है। जनता का सारा पैसा सरकार ने लुटा दिया। सरकार केवल केवल झांसा और जुमलेबाजी देकर खुद को चलाने की कोशिश कर रही है। बिहार की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब हो गई है। अब तो वित्त विभाग की ओर से भी लेटर जारी किया है। वहीं राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने कहा कि सरकार को बताना चाहिए कि जनता का पैसा कहां गया? कहां इतनी राशि खर्च कर दी गई जो ऐसा कदम सरकार की उठाना पड़ा। यह गंभीर मामला है। CAG रिपोर्ट पेश होने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि बिहार भ्रष्टाचार का गढ़ बन गया है। बिहार सरकार के हर विभाग और योजना में भ्रष्टाचार है। नीतीश सरकार ने ₹72,000 करोड़ का घोटाला कर दिया पर इतनी बड़ी राशि का कहीं अता पता नहीं है।