बिहार की राजनीति में मंत्री श्रवण कुमार का नाम संघर्ष, सादगी, समर्पण और जनसेवा का प्रतीक है। 1974 के जेपी आंदोलन से शुरू हुई उनकी राजनीतिक यात्रा आज तक बिना रुके आगे बढ़ रही है। हजारीबाग जेल में जननायक कर्पूरी ठाकुर के सानिध्य में राजनीति के आदर्शों को समझने वाले श्रवण कुमार ने पूरी जिंदगी इसी विचारधारा को आधार बनाया।
कर्पूरी ठाकुर का मार्गदर्शन और 2400 वोटों का सबक
संघर्ष से लोकप्रियता तक का सफर
हार के बावजूद श्रवण कुमार गांव-गांव घूमकर समस्याएं उठाते रहे। 1990 में जनता दल के टिकट पर 50 हजार से अधिक वोट मिले, हालांकि निर्दलीय रामनरेश सिंह से हार गए। 1993 में उनके प्रयास से लालू प्रसाद यादव ने बेन को ब्लॉक का दर्जा दिया, जिससे उनकी पहचान और मजबूत हुई।
नीतीश कुमार के विश्वसनीय साथी बने
1994 में नीतीश कुमार व जॉर्ज फर्नांडीज के नई पार्टी बनाने पर उन्होंने जनता दल बिहार के महासचिव पद से इस्तीफा देकर समता पार्टी का दामन थाम लिया। 1995 में उन्होंने नालंदा से 44,000 वोटों से जीत हासिल की। तब से वे नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद साथियों में गिने जाते हैं। 2005 में नीतीश सरकार बनने के बाद वे जेडीयू के मुख्य सचेतक रहे।
मंत्री पद की उठापटक और भूमिका
2005 में मंत्री न बनाए जाने और 2014 में मांझी मंत्रिमंडल में शुरुआत में जगह न मिलने पर उन्होंने सरकारी वाहन लौटा दिया था। मंत्रिमंडल के विस्तार में उन्हें ग्रामीण कार्य, ग्रामीण विकास एवं संसदीय कार्य विभाग मिला। उन्होंने ग्रामीण कार्य विभाग का पूरा बजट खर्च करवा कर एक भी पैसा सरेंडर नहीं होने दिया। नालंदा में 13 बड़े पुलों समेत कई संरचनाओं को मंजूरी मिली।
सादगी और जनसरोकार की पहचान