पटना के बाढ़ अनुमंडल के पंडारक प्रखंड अंतर्गत परसावां गांव में मछली पालन और मछली पकड़ने को लेकर ग्रामीणों और जीविका दीदियों के बीच बड़ा विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ गया कि मौके पर सीआई, बीडीओ, थाना अध्यक्ष समेत भारी संख्या में पुलिस बल पहुंच गया और पूरा क्षेत्र पुलिस छावनी में तब्दील हो गया।
तालाब के अधिकार को लेकर विवाद
जानकारी के अनुसार, गांव का यह तालाब पहले सार्वजनिक उपयोग में था। लगभग तीन वर्ष पूर्व इसे जीविका दीदियों को मछली पालन के लिए सौंप दिया गया था। इसके बाद जीविका दीदियों द्वारा तालाब में मछली पालन शुरू किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि यह सामूहिक तालाब है और इसमें मछली पकड़ने का अधिकार गांव के लोगों का है। उनका यह भी कहना है कि तालाब से होने वाली आय गांव के विकास कार्यों में खर्च होनी चाहिए।
ग्रामीणों और जीविका समूह में टकराव
बताया जा रहा है कि पंचायत मुखिया के हस्ताक्षर के बाद तालाब को जीविका समूह को सौंपा गया था। वहीं यह भी कहा जा रहा है कि जिलाधिकारी के निर्देश पर तालाब का लगभग पौने दो करोड़ रुपये की लागत से सौंदर्यीकरण कराया गया और इसके बाद इसे जीविका दीदियों को मछली पालन के लिए दिया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि वे पहले भी इस तालाब में मछली पकड़ते रहे हैं, लेकिन अब उन्हें रोका जा रहा है। वहीं जीविका समूह का कहना है कि तालाब विधिवत रूप से उन्हें सौंपा गया है और मछली पालन का अधिकार उन्हीं के पास है। स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब जीविका दीदियां मछली पकड़ने के लिए तालाब पर पहुंचीं और ग्रामीणों ने विरोध शुरू कर दिया।
पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई
मामले की गंभीरता को देखते हुए बीडीओ श्री नीलकमल, सीआई संजय कुमार और थाना अध्यक्ष पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास किया। सीआई संजय कुमार और बीडीओ ने ग्रामीणों से कहा कि यदि उनके पास कोई वैध दस्तावेज हैं तो वे उसे प्रस्तुत करें। साथ ही उन्होंने कहा कि इस मामले में आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार है, लेकिन कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
ग्रामीणों का पक्ष
ग्रामीण रहिस सिंह का कहना है कि कुछ लोग फर्जी कागजात के आधार पर तालाब पर अधिकार जताना चाहते थे, जिसके खिलाफ ग्रामीणों ने हाईकोर्ट में केस लड़कर जीत हासिल की थी। उनका दावा है कि तब से ग्रामीण इस तालाब में मछली पकड़ते आ रहे थे।
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पुराने फैसले का हवाला
ग्रामीण लक्ष्मण सिंह ने कहा कि उन्हें समय दिया जाए, वे कोर्ट के कागजात प्रस्तुत करेंगे। उनका दावा है कि वर्ष 1962-63 में तत्कालीन एसडीओ ने भी ग्रामीणों के पक्ष में फैसला दिया था और यह तालाब गांव के लोगों का ही है। फिलहाल प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रण में बताया है और दोनों पक्षों से दस्तावेज लेकर उच्च स्तर पर मामले की जांच की बात कही है।