राजगीर की ऐतिहासिक और पवित्र धरती पर पहली बार एशिया कप की मेजबानी हो रही है। कुछ ही पल बाद भारत और कोरिया के बीच अहम् मैच शुरू होई रहा है। पूरा देश इस आयोजन और मैच को लेकर दर्शकों में जबरदस्त उत्साह है। लगातार दो बार ओलंपिक पदक जीत चुकी भारतीय टीम अभी तक अपराजित रहते हुए फाइनल तक पहुंची है। भारतीय हॉकी के इस उपलब्धि में शिवेंद्र सिंह की भूमिका अहम रही है। इस मौके पर पूर्व राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी, कोच और कॉमेंटेटर योगेश कुमार ने ‘अमर उजाला’ के लिए पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और वर्तमान भारतीय हॉकी टीम के कोच शिवेंद्र सिंह से खास बातचीत की।
शिवेंद्र कहते हैं कि ये दो ओलंपिक मेडल मेरी कोचिंग यात्रा के सबसे गर्व के पल हैं। टोक्यो में 41 साल बाद भारत ने मेडल जीता और पेरिस में कांस्य पाना ऐतिहासिक रहा। खिलाड़ी रहते हुए उनकी पहचान एक आक्रामक और तेज़ स्ट्राइकर की थी। उसी अंदाज़ का असर आज भी दिखता है। “मैं हमेशा खिलाड़ियों को यही सिखाता हूँ कि मौक मिला तो, उन्हें गोल में बदलना है। दबाव के क्षणों में शांत रहकर फिनिशिंग करना सबसे अहम है। अपने करियर के यादगार लम्हों को याद करते हुए शिवेंद्र बताते हैं, “2010 के कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स मेरे लिए अविस्मरणीय हैं। घरेलू दर्शकों के सामने गोल करना कभी नहीं भूल सकता।
कोचिंग में पूरी टीम की जिम्मेदारी होती है
खिलाड़ी से कोच की यात्रा आसान नहीं थी। शिवेंद्र मानते हैं कि खिलाड़ी के रूप में आप सिर्फ़ अपने रोल तक सीमित रहते हैं, लेकिन कोचिंग में पूरी टीम की जिम्मेदारी होती है। रणनीति, फिटनेस, मानसिकता सब कुछ। शुरू में कठिनाई रही, मगर सीखने और सिखाने दोनों में मज़ा है। पिछले दशक में भारतीय टीम में आए बदलाव पर वे कहते हैं। अब हमारी फिटनेस, टैक्टिकल अवेयरनेस और मानसिक मजबूती दुनिया की किसी भी टीम से कम नहीं है। ओलंपिक पदकों ने पूरे देश को आत्मविश्वास दिया है।
मुझे और भी आगे बढ़ने का प्रेरणा देता है
सबसे कम उम्र में द्रोणाचार्य अवार्ड पाने पर शिवेंद्र कहते हैं कि यह सम्मान सिर्फ़ मेरा नहीं है, बल्कि उन खिलाड़ियों और सहयोगियों का भी है जिनके साथ मैंने काम किया। यह मुझे और भी आगे बढ़ने का प्रेरणा देता है। द्रोणाचार्य अवार्ड ने सम्मान तो दिया, लेकिन जिम्मेदारी भी बढ़ा दी है। अपने प्रेरणास्रोतों का ज़िक्र करते हुए शिवेंद्र बताते हैं, “खिलाड़ी रहते मैं धनराज पिल्लै से प्रभावित रहा। उनकी आक्रामकता हमेशा प्रेरणा देती थी। कोचिंग में ग्राहम रीड और वरिष्ठ कोचों से मैंने बहुत कुछ सीखा। टीम इंडिया में नए स्ट्राइकर तैयार करने की चुनौती पर वे कहते हैं, “गोल करना कला है। इसके लिए हम पेनल्टी कॉर्नर वेरिएशन, 3D स्किल्स और तेज़ रिफ्लेक्स ट्रेनिंग पर ध्यान दे रहे हैं। नई पीढ़ी आधुनिक तकनीक और पारंपरिक हुनर दोनों का उपयोग कर रही है।
निरंतरता रखोगे तो टीम इंडिया तक पहुंच सकते हो
अपने शहर से जुड़ाव पर शिवेंद्र गर्व से कहते हैं कि ग्वालियर में हॉकी का माहौल और अच्छे कोचों की मौजूदगी ने मुझे मजबूत नींव दी। उसी ने मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। नये खिलाडियों को सन्देश देते हुए वह कहतें हैं कि मेहनत करो, अनुशासन में रहो और खेल का सम्मान करो। आधुनिक हॉकी में फिटनेस, स्पीड और मानसिक ताकत उतनी ही जरूरी है जितनी स्किल। निरंतरता रखोगे तो टीम इंडिया तक पहुंच सकते हो। अपने लक्ष्यों पर शिवेंद्र स्पष्ट हैं। मेरा सपना है कि भारत लगातार दुनिया की टॉप-3 टीमों में बना रहे। मैं हर स्तर पर योगदान देता रहूं और खिलाड़ियों में यह विश्वास जगाऊं कि वे दुनिया की किसी भी टीम को हरा सकते हैं।
भारतीय हॉकी का भविष्य बेहद उज्ज्वल है
बिहार में महिला एशियन चैंपियंस ट्राफी के बाद एशिया कप के आयोजन से जुड़े सवाल के जबाव में उन्होंने कहा कि मनोरम पहाड़ियों से घिरे राजगीर का हॉकी स्टेडियम, उत्साहित दर्शक और बिहार सरकार की मेजबानी लाजवाब है। इस आयोजन से बिहार में हॉकी की लोकप्रियता बढ़ेगी और अजितेश जैसे और भी अंतर्राष्ट्रीय खिलाडी निकलेंगे। शिवेंद्र सिंह का मानना है कि भारतीय हॉकी का भविष्य बेहद उज्ज्वल है। वह कहते हैं कि हमारे पास प्रतिभाशाली युवा खिलाड़ी लगातार आ रहे हैं। जूनियर स्तर पर भारत ने हाल के वर्षों में शानदार प्रदर्शन किया है।
शिवेंद्र सिंह एक नज़र में
- पूरा नाम: शिवेंद्र सिंह
- जन्म: 9 जून 1983, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
- पोज़ीशन (खिलाड़ी के रूप में): फॉरवर्ड (स्ट्राइकर)
करियर की खास उपलब्धियां:
- 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स (दिल्ली) – सिल्वर
- 2010 एशियन गेम्स (ग्वांगझू) – कांस्य
- 2007 एशिया कप (चेन्नई) – गोल्ड
- भारत की ओर से 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय मैच खेले
कोचिंग उपलब्धियाँ:
- टोक्यो ओलंपिक 2020 – ब्रॉन्ज
- पेरिस ओलंपिक 2024 – ब्रॉन्ज
सम्मान:
- भारत का सबसे कम उम्र का द्रोणाचार्य अवार्ड (हॉकी)
पहचान:
- आक्रामक खेल शैली और फिनिशिंग क्षमता
- बतौर कोच भारतीय हॉकी के आक्रामक खेल को नई दिशा देने में अहम भूमिका