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बिहारः अब क्या करेंगे जीतनराम मांझी?

Sun, 22 Feb 2015 03:59 PM IST
उर्मिलेश / वरिष्ठ पत्रकार
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बिहार में जीतन राम मांझी के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद दो हफ्ते से ज्यादा चले नाटकीय घटनाक्रम का अंत हो गया। अब सवाल यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के बाद बिहार की राजनीति किस दिशा में जाएगी। इस पूरे घटनाक्रम से जीतनराम मांझी को क्या हासिल हुआ और भाजपा, जेडीयू के हाथ क्या आया? मांझी के सामने अब तीन विकल्प हैं।
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पहला तो यह कि वह एक क्षेत्रीय दल बनाएं और महादलित समुदाय को लामबंद करें। इसके बाद वह स्थानीय दल की हैसियत से वह एनडीए के साथ जाएं। अब चूंकि भाजपा इस प्रकरण में खुलकर उनके समर्थन में आगे आई है इसलिए ऐसा माना जा सकता है कि वह बीजेपी के साथ जाएंगे। दूसरा विकल्प यह है कि सीधे भाजपा में चले जाएं।

तीसरा विकल्प यह है कि वह क्षमायाचना कर कहें कि वह अभी जेडीयू में ही बने रहना चाहते हैं। इसकी संभावना अभी कम नज़र आती है क्योंकि प्रेस कॉंफ्रेंस में वह जो कुछ बोल चुके हैं उसे देखते हुए लगता नहीं कि वह जेडीयू के दरवाज़े उनके लिए खुलेंगे।
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भाजपा को क्या मिला?

भारतीय जनता पार्टी बिहार में बहुत खूबसूरती के साथ सोशल इंजीनियरिंग करती रही है। यह कहा जा सकता है कि दिल्ली में भाजपा की सारी रणनीति धरी की धरी रह गई लेकिन बिहार में सोशल इंजीनियरिंग के मोर्चे पर वह काफी कामयाब रहे हैं, हालांकि अंकगणित के मोर्चे पर वह अब भी कमजोर हैं।

मांझी कार्ड के जरिए उन्होंने महादलितों में पैठ बनाई है। इसके अलावा उन्होंने पिछड़ों में और तो और लालू प्रसाद यादव के वोटबैंक यादवों में भी घुसपैठ की है। जेडीयू और नीतीश कुमार मांझी से यूं ही नाराज़ नहीं हुए थे। मांझी भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी से संपर्क में थे। वह बार-बार धमकी देते थे कि जेडीयू को कि अगर आप मुझे परेशान करेंगे तो मैं 20 मिनट में प्रधानमंत्री से बात कर सकता हूं।
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जेडीयू को फायदा?

यह भाजपा का मास्टरस्ट्रोक था- एक मुख्यमंत्री को उसकी पार्टी से, उसके नेता से तोड़ना। लेकिन यह फेल हो गया और पार्टी की फजीहत हुई, राज्यपाल की भूमिका की भी आलोचना हुई है।

ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार इसे भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। इस पूरे प्रकरण से नीतीश कुमार को एक नैतिक बल मिलेगा और वह ज्यादा विश्वास के साथ चुनाव मैदान में उतरेंगे।
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