पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किशोरावस्था में हुई गलती के आधार पर किसी व्यक्ति को जीवनभर अपराधी नहीं माना जा सकता। अदालत ने बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस में सिपाही पद पर एक अभ्यर्थी का चयन रद्द करने के आदेश को निरस्त करते हुए अधिकारियों को पूरे मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने गोपालगंज निवासी राहुल कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने मुजफ्फरपुर स्थित बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस-6 के कमांडेंट की ओर से एक अगस्त, 2025 को पारित आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही संबंधित अधिकारियों को अदालत की टिप्पणियों के आलोक में चार महीने के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
राहुल कुमार ने बिहार पुलिस में सिपाही भर्ती के लिए आयोजित लिखित और शारीरिक परीक्षाएं उत्तीर्ण की थीं। इसके बाद उसने एक जून, 2025 को बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस-6 में योगदान दिया था।
चरित्र सत्यापन में सामने आया था मामला
चरित्र सत्यापन के दौरान वर्ष 2016 के एक आपराधिक मामले की जानकारी सामने आई थी। आवेदन पत्र और सत्यापन प्रपत्र में इस मामले का उल्लेख नहीं करने के आधार पर अधिकारियों ने अभ्यर्थी का चयन रद्द कर दिया था।
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मामले की समीक्षा के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित घटना के समय याचिकाकर्ता किशोर था। किशोर न्याय बोर्ड ने 17 अक्तूबर, 2025 को मामले का निपटारा किया था। बोर्ड ने याचिकाकर्ता के पारिवारिक परिवेश और आचरण को ध्यान में रखते हुए उसे 40 पौधे लगाने और एक महीने तक उनकी देखभाल करने का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम भारत संघ और रवींद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने के हर मामले को स्वतः अयोग्यता का आधार नहीं माना जा सकता।
किसी अभ्यर्थी की नियुक्ति रद्द करने से पहले मामले के सभी तथ्यों, आरोपों की गंभीरता और अभ्यर्थी की आयु जैसे पहलुओं पर वस्तुनिष्ठ तरीके से विचार करना आवश्यक है। अदालत ने मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए चयन रद्द करने के फैसले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।