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Bihar: अंग्रेजी शासन में हालात अब से बेहतर थे... मायूसी में बोले ग्रामीण, सरकार से उम्मीद भी टूटी; जानें मामला

Sun, 10 Nov 2024 09:32 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरपुर

सार

Muzaffarpur News: मुजफ्फरपुर के एक गांव के लोग आज भी एक अति जोखिमपूर्ण पुल से गुजरने के लिए मजबूर हैं, जिससे उनकी सुरक्षा को खतरा है। गांव के लोग महसूस करते हैं कि यह स्थिति सुधारने के लिए सरकार का ध्यान जरूरी है।
 
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जान को जोखिम डालकर चचरी पुल को पार करते ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मुजफ्फरपुर जिले के औराई प्रखंड क्षेत्र स्थित राजखंड दक्षिण पंचायत के कोकिल बारा गांव के लोग आज भी अपनी दुर्दशा को लेकर परेशान हैं। इस गांव के लोग इन दिनों खतरे से भरे एक पुल से होकर अपने गांव में आने-जाने के लिए मजबूर हैं। यह पुल कभी भी टूट सकता है। यहां आने जाने के लिए लोगों को हमेशा जान का जोखिम उठाना पड़ता है। गांव के सैकड़ों लोग इस पुल का इस्तेमाल करते हैं, जो अब तक सुरक्षित नहीं है।

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जान का खतरा मोल लेकर आवागमन करते हैं ग्रामीण
ग्रामीणों के अनुसार, इस चचरी पुल से गुजरना किसी खतरे से कम नहीं है। पुल की हालत इतनी खराब है कि इसे कभी भी नुकसान हो सकता है और बाढ़ के समय स्थिति और भी विकट हो जाती है। दरअसल, इस चचरी पुल के नीचे एक गहरी खाई है, जिससे गिरने पर जान जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। यही नहीं, बाढ़ के दौरान इस गांव में जाना तो और भी मुश्किल हो जाता है और कई बार तो दूसरे जिले से होकर जाना पड़ता है।
 
‘अंग्रेजी शासन में बिना डर के आ-जा सकते थे लोग’
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि 600 साल पहले जब गांव में काठ का पुल था तो लोग बिना किसी डर के यहां से वहां आ जा सकते थे। वह पुल मजबूत और सुरक्षित था, लेकिन समय के साथ वह भी खत्म हो गया। अब जो चचरी पुल बना है, वह कभी भी टूट सकता है और हर वक्त खतरा रहता है।
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ग्रामीणों का कहना है कि अब यह पुल उनके लिए संकट बन गया है, खासकर बाढ़ के मौसम में। उन्हें लगता है कि अंग्रेजी शासन के समय स्थिति बेहतर थी, क्योंकि उस समय इस तरह के जोखिमपूर्ण रास्ते नहीं होते थे। लोग बिना डर के यात्रा कर सकते थे और बाढ़ के दौरान समस्याएं कम होती थीं।


 
महिलाओं की सुरक्षा भी खतरे में
गांव की महिला सुनीता देवी ने भी अपनी समस्या साझा करते हुए कहा कि हम रोजाना चारा लाने के लिए इस पुल से गुजरते हैं। यह हमारे लिए जान हथेली पर लेकर चलने जैसा है। कभी भी गिरने का खतरा बना रहता है। सुनीता देवी ने कहा कि पहले जब काठ का पुल था, तब किसी भी तरह का जोखिम नहीं था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है।
 
शादी-ब्याह में भी आती हैं मुश्किलें
गांव में शादी और विवाह जैसे आयोजनों में भी यही पुल मुसीबत का कारण बन जाता है। सुनीता देवी बताती हैं कि अगर गांव में शादी-ब्याह हो तो बारात को पहले ही रोक देना पड़ता है, ताकि कोई बड़ा हादसा न हो जाए।
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सरकार से उम्मीद टूटी
वहीं, ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ के दो महीने के कठिन समय के बाद भी बाकी दिनों में पुल का यह खतरा लगातार बना रहता है। उन्हें अब सरकार से कोई उम्मीद नहीं रही। उनका कहना है कि अगर सरकार इस पर ध्यान देती तो उनकी परेशानी खत्म हो सकती थी।

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