बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पानापुर गांव में बूढ़ी गंडक नदी के किनारे स्थित भस्मी देवी का उपशक्तिपीठ आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि यहां आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।
मंदिर परिसर में बने हवन कुंड की भस्म से इसका नाम ‘भस्मी देवी’ पड़ा। मान्यता है कि यहीं पर देवी सती का कपोल (गाल) गिरा था, जिसके कारण यह स्थान उपशक्तिपीठ के रूप में विख्यात हुआ। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां भस्मी देवी भक्तों के सभी कष्ट और रोगों को ‘भस्म’ कर देती हैं। मंदिर की भस्म को भक्त आशीर्वाद के रूप में अपने घर ले जाते हैं।
आंचल पर बच्चे को नचवाने की परंपरा
इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा संतान प्राप्ति से जुड़ी है। मान्यता है कि संतान की इच्छा रखने वाली महिलाएं यहां आकर अपने आंचल पर बच्चे को बैठाकर गोल-गोल घुमाती हैं। इसे आंचल पर नचवाना कहा जाता है। इस लोक परंपरा के निर्वहन के बाद महिलाएं आशीर्वाद स्वरूप बच्चे के आंचल को लेकर घर लौटती हैं। माना जाता है कि इस अनुष्ठान से उनकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
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कबूतर उड़ाने की मान्यता
मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां कबूतर उड़ाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। दूर-दराज के जिलों से लोग विशेष रूप से कबूतर उड़ाने के लिए भस्मी देवी मंदिर पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस रिवाज से मां भस्मी देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपनी विशेष कृपा बरसाती हैं।
साधना पीठ के रूप में पहचान
मंदिर के पुजारियों के अनुसार भस्मी देवी का यह स्थान कोई साधारण धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि देश के प्रमुख उपशक्तिपीठों में से एक है। यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और विशेष अवसरों पर मंदिर में मेले जैसा दृश्य देखने को मिलता है।