बिहार के बेगूसराय जिले के बखरी स्थित पुरानी दुर्गा मंदिर की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, लोक परंपराओं और तंत्र साधना से जुड़ी मान्यताओं के केंद्र के रूप में भी है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, करीब 600 वर्ष पुराने इस मंदिर की स्थापना परमार वंश के राजाओं ने कराई थी। शारदीय नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। खासकर महाअष्टमी की रात विशेष पूजा-अर्चना होती है, जिसमें दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु और साधक पहुंचते हैं। मंदिर की ख्याति बिहार से निकलकर झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और पड़ोसी देश नेपाल तक फैली बताई जाती है। मां दुर्गा के प्रति अटूट विश्वास रखने वाले श्रद्धालु यहां संतान प्राप्ति, रोगों से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना लेकर पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी प्राचीन परंपराएं, बहुरा मामा की गाथा और तंत्र साधना से संबंधित लोकमान्यताएं इसे क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं।
महाअष्टमी की रात विशेष पूजा, 56 भोग अर्पित करने की परंपरा
नवरात्र के दौरान बखरी की पुरानी दुर्गा मंदिर में भक्ति और उत्साह का विशेष माहौल रहता है। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, महाअष्टमी की रात मां दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा के साथ तंत्र साधना की परंपरा भी जुड़ी हुई है। इस अवसर पर माता को 56 प्रकार के भोग अर्पित किए जाने की मान्यता है।
बहुरा मामा की गाथा आज भी लोगों को करती है आकर्षित
बखरी की पुरानी दुर्गा मंदिर की पहचान के साथ बहुरा मामा नामक तंत्र साधिका की गाथा भी जुड़ी हुई है। स्थानीय लोगों के अनुसार, बहुरा मामा मां दुर्गा की अनन्य भक्त थीं और शाबर मंत्रों की साधना के लिए प्रसिद्ध थीं। कहा जाता है कि उन्होंने अपने समय में महिलाओं को संगठित किया और शिक्षा से जुड़ी गतिविधियां भी संचालित कीं। बहुरा मामा से जुड़ी कई लोककथाएं आज भी इस क्षेत्र में सुनाई जाती हैं। स्थानीय लोगों की स्मृतियों में उनकी छवि एक ऐसी महिला के रूप में बनी हुई है, जिन्होंने अपने दौर में नारी शक्ति का परिचय दिया। मंदिर परिसर और उससे जुड़ी परंपराओं में उनकी गाथा आज भी श्रद्धा और जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।
तंत्र साधना की मान्यताओं से भी जुड़ा है बखरी
बखरी को लंबे समय से तंत्र साधना की परंपराओं से जोड़कर देखा जाता रहा है। क्षेत्र में प्रचलित कहावतें और लोककथाएं इस पहचान को और रोचक बनाती हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, नवरात्र के दौरान विशेष रूप से महाअष्टमी की रात यहां साधक पहुंचते हैं। हालांकि, तंत्र साधना और उससे जुड़ी सिद्धियों को लेकर किए जाने वाले दावे धार्मिक आस्था और स्थानीय मान्यताओं का हिस्सा हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि होना अलग विषय है। इसके बावजूद मंदिर की ऐतिहासिक पहचान और इससे जुड़ी लोकपरंपराएं आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचते हैं श्रद्धालु
मंदिर समिति के अध्यक्ष रत्नेश्वर प्रसाद सिंह के अनुसार, यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। उनका कहना है कि पूर्वजों के समय से चली आ रही परंपरा के तहत यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई थी। तब से मंदिर में पूजा-अर्चना का क्रम जारी है। वहीं, बनारस के अस्सी घाट से आए तरुण तिवारी ने बताया कि दुर्गा महाआरती संपन्न कराने के लिए पांच पंडितों की टीम यहां पहुंची है। उनके अनुसार, मां दुर्गा के प्रति लोगों की गहरी आस्था के कारण देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
आस्था, इतिहास और लोकसंस्कृति का संगम है पुरानी दुर्गा मंदिर
बखरी की पुरानी दुर्गा मंदिर की विशेषता इसकी प्राचीनता के साथ-साथ इससे जुड़ी कहानियों, पूजा-पद्धतियों और लोकविश्वासों में भी दिखाई देती है। एक ओर नवरात्र के दौरान मां दुर्गा की आराधना के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, तो दूसरी ओर बहुरा मामा की गाथा और तंत्र साधना से जुड़ी मान्यताएं इस स्थल को अलग पहचान देती हैं। करीब छह शताब्दियों पुरानी बताई जाने वाली इस मंदिर परंपरा में भक्ति, लोकइतिहास और नारी शक्ति की कहानियां एक साथ देखने को मिलती हैं। यही वजह है कि बेगूसराय के बखरी की पुरानी दुर्गा मंदिर आज भी क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।