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मोदी की आंधी में बुझी लालटेन, टूटा नीतीश का दंभ

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लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर थी ये बात अब सब मान चुके हैं। विरोधी पार्टियां हार की समीक्षा कर रही हैं और बीजेपी जश्न मनाने में जुटी है।
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बिहार में भी मोदी की आंधी कुछ ऐसी चली कि उसके सामने लालू और नीतीश टिक नहीं पाए। हाल ये हुआ कि जिस बिहार में बीजेपी सीटों और वोटों के लिए तरसती थी वहां की 40 सीटों में से 22 सीटों पर उसकी जीत हुई।

वोट शेयर के मामले में भी बीजेपी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। उसे 29.4 प्रतिशत वोट मिला। मोदी की आंधी में कई बड़े कद्दावर दरख्त जड़ों समेत उखड़ गए।
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नीतीश को बिहार ने नकार दिया?

पानी पी-पीकर मोदी को कोसने वाले और चंद रोज पहले तक तीसरे मोर्चे की नाव पर बैठ कर सेवेन आरसीआर तक पहुंचने का सपना देखने वाले नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को बिहार में मात्र दो सीटें मिलीं।

बिहार को 'कुशासन से सुशासन' की ओर ले जाने वाले 'विकास पुरूष' नीतीश कुमार को जनता ने ऐसा दर्द दिया है जिसकी टीस उनको लंबे समय तक महसूस होती रहेगी।

जेडीयू अध्यक्ष और पूर्व एनडीए संयोजक शरद यादव को भी हार का स्वाद चखना पड़ा और प्रकाश झा जैसे दिग्गज फिल्मकार भी अपनी सीट नहीं बचा सके। सवाल ये है कि क्या अब ये मान लिया जाए कि बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को नकार दिया?

लालू भी हो गए फेल

मोदी को मैदान-ए-जंग में आने का न्यौता देने वाले, बिहार के सबसे बड़े खिलाड़ी माने जाने वाले लालू यादव भी मोदी की आंधी से चित्त हो गए। माना जा रहा था उनको बिहार में खासा फायदा होगा लेकिन उनके हिस्से आईं मात्र चार सीटें।

हाल ये हुआ कि ना तो लालू यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी जीत पाईं और ना ही लालू की बेटी मीसा ही। हालांकि राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने मधेपुरा सीट पर शरद यादव को हरा दिया।

कई सीटों पर आरजेडी नंबर दो पर रही लेकिन नतीजे उम्मीदों के विपरीत रहे। मोदी की जीत से लालू को इतना क्रोध आया कि उन्होंने मोदी को बधाई देने से भी इंकार कर दिया।

जनता ने दिए ये सबक

नीतीश और लालू दोनों को बिहार की जनता ने अपना फैसला सुना दिया। दोनों स्तब्ध हैं, हैरान हैं और परेशान भी हैं। सोच रहे हैं कि कहां और क्या कमी रह गई जो जनता ने दामन छुड़ा लिया।

बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ने वाले नीतीश कुमार बेशक बिहार में बिजली पानी लाने का दावा करते हों, लालू सांप्रदायिकता के खिलाफ ताल ठोकते हों लेकिन जनता ने दोनों को ही नकार दिया।

बिहार की 40 में से 22 सीटों पर केसरिया झंडा लहराया है। सुशील मोदी और गिरिराज सिंह बिहार बीजेपी के बड़े नेता बनकर उभरे हैं हालांकि असली दमखम का पता तो विधानसभा चुनाव में ही चलेगा।
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सही समय पर सही फैसला

बिहार की क्षेत्रीय पार्टियों में से सबसे अधिक फायदा लोक जनशक्ति पार्टी को हुआ। हाजीपुर से राम विलास पासवान ने कांग्रेस उम्मीदवार को हरा दिया तो वहीं उनके बेटे चिराग पासवान ने जमुई सीट से जीत दर्ज कराई।

कुछ वक्त पहले तक जिस पार्टी की हालत बेहद खराब थी और उसके भविष्य तक पर सवाल खड़े किये जा रहे थे उसने इस लोकसभा चुनाव में छह सीटें जीतीं। इस चुनाव में एलजेपी ने बीजेपी के साथ गठजोड़ किया था जिसका उसे फायदा भी मिला।

रामविलास के बेटे चिराग भले ही फिल्मों में फ्लॉप रहे हों लेकिन इस चुनाव में उन्होंने साबित कर दिया कि वो राजनीति में मैदान में कच्चे खिलाड़ी साबित नहीं होने वाले।
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