सोलह साल पहले बिहार के लक्ष्मणपुर-बाथे नरसंहार में कई परिवार अनाथ हो गए थे। यहां तक कि कुछ घरों में घर संभालने वाली एक महिला तक नहीं बची थीं। कुछ परिवारों में सभी बुजुर्ग या जवान मौत की नींद सो गए। पीछे बच गए थे सिर्फ बच्चे।
मारे गए लोगों में तीन साल के बच्चे से लेकर 65 साल के बुजुर्ग तक शामिल थे।
नरसंहार में इन परिवारों ने जो भुगता वह एक तरफ, इसके बाद इन पर जो गुजरा, वह दास्तां भी कम दर्दनाक नहीं है।
ऐसे ही तीन लोगों की कहानियां, जिन्होंने हत्याकांड के बाद किसी तरह अपनी बिखरी हुई जिंदगी को समेटा और भविष्य को संवारने में जुट गए।
'लाशें ट्रैक्टर में भरकर ले गए थे'
एक दिसंबर 1997 का दिन लड्डू चंद चौधरी के परिवार के लिए मौत लेकर आया था। हत्यारों ने एक ही आंगन में नौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।
लड्डू के माता-पिता, उनके भाई, दो भाभियां, दो भतीजे और दो भतीजियों के निर्जीव शरीर उनकी आंखों के सामने थे। वह खुद नहीं समझ पाए कि आखिर उनके परिवार का दोष क्या था। घर संभालने के लिए एक महिला भी नहीं बची थी।
नरसंहार की खबर मिली तो लड्डू की बहन पार्वती देवी तुरंत अपने मायके पहुंचीं। उनकी शादी करीब दस साल पहले लक्ष्मणपुर के पास ही गांव बेलाग में हुई थी।
उस दिन का मंजर आज भी पार्वती को ऐसे याद है मानो कल की बात हो। गुस्से और डर की मिली-जुली भावनाएं उनके चेहरे पर आकर चली जाती हैं।
वे बताती हैं, ''लाशों को ट्रैक्टर में भरकर सोन नदी के किनारे ले जाया गया था। आदमी तो आदमी जानवर तक महीने भर रोए थे।''
पार्वती ने फैसला लिया, ससुराल नहीं जाएंगी। आखिर अनाथ बच्चों को कौन संभालता। वह कहती हैं, ''घर में छोटे-छोटे भाई-भतीजे रह गए थे। ऐसे में मैं उन्हें बनाने-खिलाने के लिए मायके में ही रह गई।''
पार्वती अपना ससुराल छोडकर अगले करीब पांच साल मायके में ही रहीं, जब तक कि घर में नई बहू नहीं आ गई।
'बेवा की शादी की दूसरे बेटे से'
दुखिया देवी के पति और दो बेटे भी उन दुर्भाग्यशाली लोगों में थे जिन्हें हत्यारों ने मौत के मुंह में धकेल दिया। मछुआरा समुदाय के ये पिता-पुत्र उस रात सोन नदी में मछली मारने गए थे।
तीनों लौटे तो गांव में घुसने से पहले ही सोन नदी के किनारे हत्यारों ने उनकी गला रेतकर हत्या कर दी।
हत्यारों का मकसद यह था कि हमले की खबर न फैलने पाए। अगर वो जाते तो यह खबर फैल सकती थी।
मारे गए बेटों में से दुखिया के एक बेटे की शादी कुछ ही दिन पहले हुई थी।
इसके बाद बीते 16 साल दुखिया के लिए बेहद संघर्ष भरे रहे। बकौल दुखिया उन्हें सामान्य होने में ही करीब दो साल लग गए। दूसरी जिम्मेदारियों के साथ-साथ उनके सिर पर जवान विधवा बहू पुनिया देवी की चिंता भी सवार थी।
नरसंहार के बाद उन्होंने अपनी बहू को उसके मायके भेजा। घर में पीछे बचे दो बेटों में से सबसे छोटे बेटे डेमन को विधवा बहू से शादी करने को तैयार किया और एक साल के भीतर डेमन से पुनिया की शादी करवाकर बहू को वापस घर ले आईं।
मुआवजे के पैसों से दुखिया ने पक्का मकान बना लिया था। उसी के एक हिस्से में अब एक साल से दुखिया बहू पुनिया के साथ महिलाओं के श्रृंगार की सामग्री बेचकर कुछ पैसे कमा लेती हैं।
'नहीं मिली नौकरी'
लक्ष्मणपुर बाथे के रहने वाले विमलेश राजवंशी को छोड उनके परिवार में कोई नहीं बचा था। हत्यारों ने सभी पांच लोगों को मार दिया था। इनमें उनके पिता, दो भाई और दोनों भाभियां शामिल थीं।
इत्तेफाकन दोनों भाइयों की शादी इस वारदात के कुछ दिन पहले हुई थी और दोनों के कोई संतान नहीं थी। विमलेश हमले में बुरी तरह जख्मी हो गए थे। हत्यारों की गोली उनके चेहरे को पार कर निकल गई थी।
एक महीने तक वह पटना के पीएमसीएच में भर्ती रहे। इलाज खत्म होने पर घर लौटे तो मानो सूना घर काटने को दौडता था।
सरकारी मरहम के बतौर विमिलेश को भी नौकरी का भरोसा मिला था। तब वह नाबालिग थे। मगर बालिग होने के बावजूद आज तक उन्हें नौकरी नहीं मिली है। वह बताते हैं कि सालों जूते घिसने और 50 हजार रूपए सिर्फ नौकरी के लिए दौडभाग और घूस में खर्चने के बावजूद उन्हें सिर्फ आश्वासन मिले। सिर्फ पांचवीं तक पढाई कर पाना भी उनकी नौकरी की राह में बाधा बन गया।
मगर अब विमलेश ने अपने सपने पूरे करने की ठान ली है। किसी पारिवारिक जिम्मेदारी को उन्होंने पत्नी रीता की पढाई के आडे नहीं आने दिया और उन्हें इंटरमीडिएट कराया। रीता अब सरकारी नौकरी पाने की कोशिश कर रही हैं।