पिछले दो दिनों से मीडिया में जिस तरह बहुत सारी रिपोर्ट और लेख आ रहे हैं, उन्होंने मुझे ये सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि क्या 2014 के पहले नरेंद्र मोदी ने और 2015 के पहले नीतीश कुमार ने शायद कोई चुनाव जीता ही नहीं और ये पूरा चमत्कार एक प्रशांत किशोर नाम के शख्स के कारण ही हुआ है। बिना कुछ और कहे मैं ये बात साफ कर देना चाहता हूं कि चुनाव में प्रचार अभियान का अपना महत्व है और इस विधा का समझदारी से उपयोग होने पर फायदा होता है। पर ये कह देने के बाद ये भी सही है कि कैंपेन की अपनी सीमाएं होती है और किसी भी चुनावी विजय में कैंपेन या उसके मैनेजर को पूरा श्रेय नहीं दिया जा सकता।
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मीडिया में यह 'प्रशांत किशोर कैंपेन' इस बात को भी सोचने के लिए मजबूर करता है कि कहीं इन चुनावों के असली हीरो लालू यादव के श्रेय को कम करने की सोची समझी रणनीति तो नहीं है। आखिर बाजारवादी ताकतों के लिए और तेजी से आर्थिक सुधार चाहने वालों को लालू, नीतीश की तुलना में बहुत कठिन व्यक्ति लगते हैं।
नरेंद्र मोदी, प्रशांत किशोर के पहले ही गुजराज में तीन विधानसभा चुनावों में भारी सफलता अर्जित कर चुके हैं। इसी तरह नीतीश कुमार भी 1998, 1999 और 2009 के लोकसभा चुनावों के अलावा 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों में एनडीए के सफल विजय अभियान का बिहार में नेतृत्व कर चुके हैं। ऐसे में 2014 में मोदी और 2015 के चुनाव परिणामों के लिए कैंपेन और उसके मैनेजर को एक सीमा से अधिक दिया जाने वाला श्रेय इन दोनों नेताओं के राजनीतिक चातुर्य और उनकी चुनाव जीताने की क्षमता को ही संदेह के घेरे में ला देता है। कोई चुनाव महज आखिरी कुछ महीनों में हारा या जीता नहीं जाता बल्कि उसकी बिसात कम से कम एक-डेढ़ साल पहले बिछने लगती है। 2014 के चुनाव की बिसात तो 2011 में ही 2जी, कॉमनवेल्थ घोटालों के सामने आने और अन्ना हजारे और बाबा रामदेव द्वारा शुरू किए गए अभियानों से बिछने लगी थी।
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संघ के कार्यकर्ताओं ने किया प्रचार
इन अभियानों को संघ परिवार ने शुरू कराया या अपने आप उनके शुरू होने के बाद, यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में इन आंदोलनो का उपयोग किया इस विषय को छोड़ दे तो इतना तो सभी मानेंगे की कोलगेट के सामने आने के बाद ही यह तय हो गया था कि यूपीए आने वाले चुनाव में हारने वाली है। जहां 2जी और कॉमनवेल्थ घोटालों की समझ केवल पढ़े लिखे वर्ग तक थी वहीं ऊर्जा के सबसे बड़े श्रोत कोयला घोटाले ने यूपीए के महा भ्रष्टाचार को घर-घर पहुंचा दिया।
आरएसएस की विचारधारा से सहमत ना होते हुए भी इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि उसके कार्यकर्ता कई सालों से बीजेपी के पक्ष में और नरेंद्र मोदी को पीएम पद के लिए सामने लाने के निर्णय के बाद गांव गांव घूम कर अपनी विचारधारा को आगे पहुंचा रहे हैं। मोदी की 2014 विजय के लिए प्रशांत किशोर और उनके कैंपेन को प्रमुख कारण मानने वाले कितने लोगों को पता है कि आरएसएस का एक 'निर्माण प्रकल्प' है। जिसमें वे एससी और एसटी छात्रों को मुफ्त में कोचिंग और किताबें दे रहे हैं। यह कार्यक्रम आरएसएस की 'वनवासी कल्याण समिति' जैसी संस्था के देख रेख में और आरएसएस में शामिल शिक्षकों के द्वारा संचालित है। अब किसी परिवार के एक बच्चे को भी यदि 'निर्माण प्रकल्प' से लाभ होगा तो उसका तो पूरा परिवार आरएसएस का मूरीद हो जाएगा।
बिहार के चुनाव की अगर बात की जाए तो इसकी भूमिका भी 2014 लोकसभा परिणामों से ही बन गई थी, जब केवल 38 प्रतिशत वोट पाने के बावजूद एनडीए 40 में 31 सीट पर विजयी हुआ था। जबकि अलग अलग लड़े कांग्रेस, जेडीयू और आजेडी के कुल वोट 45 प्रतिशत थे। नीतीश लालू की सेक्यूलर राजनीति की प्रतिबद्धता ने उन्हें साथ आने के लिए प्रेरित किया और जून 2014 के राज्यसभा चुनावों में आरजेडी विधायकों ने जेडीयू के पक्ष में वोटिंग की। चार माह बाद हुए दस विधानसभा सीट के लिए उपचुनावों में कांग्रेस, जेडीयू और आरजेडी ने क्रमशः 2 और 4-4 सीट पर गठबंधन बना के चुनाव लड़ा और 6 सीट पर विजय पाई। अर्थात उनके वोटर्स ने इस गठबंधन स्वाभाविक मानते हुए मंजूर किया। इस समय मोदी बुखार उतार नहीं था और कोई प्रशांत किशोर भी नीतीश के साथ नहीं थे।
मोदी बनाम लालू की जंग
लगातार कट्टर हिंदुत्व की लाइन लेने, दिल्ली चुनाव में सेक्यूलर वोटर्स का ध्रुवीकरण होने, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और महंगाई के खिलाफ अभियान के साथ साल भर में मोदी सरकार की कोई उल्लेखनीय सफलता ना होने ने आज के बिहार चुनाव परिणामों की पटकथा पहले ही लिख दी थी और यही वह समय है जब प्रशांत किशोर ने नीतीश का हाथ थामा था।
यह सही है कि प्रशांत किशोर और उनकी टीम द्वारा संचालित अभियान एक अच्छा और सौम्य अभियान रहा जिसने बीजेपी के उग्र अभियान के मुकाबले एक विनम्र विकल्प होने का दावा किया। निश्चित रूप से इस अभियान का लाभ महागठबंधन को हुआ है। परंतु लालू यादव ने जो चुनाव अभियान अपने ही अंदाज में चलाया अंततः वही इस चुनाव का दिशा निर्देशक साबित हुआ। 'जंगल राज पार्ट 2' के जवाब में 'मंडल राज पार्ट 2', 70 हजार 80 हजार 90 हजार करोड़ के पैकेज का माखौल हो या 'शैतान' के जवाब में 'ब्रह्म पिचाश' हर बार लालू, मोदी और शाह की जोड़ी पर भारी पड़ रहे थे। लगभग हर मौके पर 'नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे' कह कर दूसरे के वोटों का ट्रांसफर भी उन्होंने ही सुनिश्चित किया।
प्रशांत किशोर का अभियान नीतीश केंद्रीत था। 'पर्चा पर चर्चा', 'मुन्ना नीतीश' जैसे सारे कदम के केंद्र में नीतीश थे। यह इसलिए क्योंकि दूसरे राजनीतीक पंडितों की तरह शायद वो भी ये मानते थे कि लालू किसी ना किसी तरह दायित्व हैं और नीतीश ही स्टार कैंपेनर हैं। जबकि वास्तव में लालू-नीतीश की जोड़ी 1990 के दशक की अटल-आडवाणी की जोड़ी की तरह थी जिसमें सौम्य चेहरा नीतीश और बड़ा जनाधार लालू के पास था। जो लोग आज प्रशांत किशोर के कैंपेन को ही प्रमुख कारण मान रहे हैं उन्हें इस बात का भी कारण बताना चाहिए की आरजेडी की सीट जेडीयू से अधिक कैसे आई जबकि आरजेडी, जेडीयू के मुकाबले बीजेपी से आधी सीट पर सीधे मुकाबले में थी।
जेडीयू ने उसकी तुलना में लोजपा, हम और आरएलएसपी जिनका प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा, के खिलाफ लड़ी। चुनाव के परिणाम भी उक्त बातों को साबित करने हैं। आंकड़ो की बात करें तो महागठबंधन के दलों को 2014 के सम्मिलित 45 प्रतिशत के मुकाबले, 42 प्रतिशत वोट मिले थे परंतु एनडीए को भी 2014 के 38 प्रतिशत की तुलना में 4 फीसदी कम वोट मिले यानि महज 34 प्रतिशत।
एक बहुत बड़ा तथ्य लोगों के ध्यान में नहीं आया कि 'अन्य' के खाते में 22 फीसदी से अधिक वोट गया है। इसका मतलब ये है कि वोट कटवा प्रत्याशियों जिन्हें अधिकतर बीजेपी ने खड़ा कराया था उन्होंने उनको ही ज्यादा नुकसान पहुंचाया। महागठबंधन की पहले ही सुनिश्चित जीत को महा-जीत में बदलने के लिए मोदी-शाह से लेकर कई नेताओं की भाषा का भी जबरदस्त योगदान रहा। उनके उग्र बयानों ने उनके ही सेक्यूलर सहयोगी दलों के वोट ट्रांसफर ना हो ऐसा होना सुनिश्चित कर दिया।
सामान्य रूप से मैं किसी एक व्यक्ति के बारे में इतना लिखने का आदी नहीं हूं, पर इस देश में राजनीतिक व्यक्तियों के योगदान को कम करके दिखाने की परिपाटी ने मुझे आज इस लेख को लिखने के लिए मजबूर किया। बिहार की जीत नीतीश और लालू की राजनीतिक परिपक्वता और उनके सेक्यूलर प्रतिबद्धता का नतीजा है और उसके असली हकदार भी वही हैं।