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Sharda Sinha: बिहार कोकिला ने गांव में ही ली थी संगीत की शुरुआती तालीम, भाई की शादी में गाया था पहला गीत

Wed, 06 Nov 2024 06:55 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सुपौल

सार

Sharda Sinha: बिहार कोकिला शारदा सिन्हा की चचेरी भाभी निर्मला ठाकुर ने बताया कि उनकी पहली प्रस्तुति अपने बड़े भाई की शादी में हुई थी। देहर छेकाई की रस्म के दौरान शारदा ने पहली बार गीत गाया। पढ़ें पूरी खबर...।
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31 मार्च को सुपौल के हुलास में छोटे भाई और भाभी के साथ शारदा सिन्हा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बिहार की अमर आवाज और लोक संगीत की अद्वितीय हस्ती डॉ. शारदा सिन्हा का मंगलवार रात निधन हो गया। अपनी सादगी और मिठास भरे लोकगीतों से देश और बिहार को छठ महापर्व की रस्मों और लोकजीवन से परिचित कराने वाली शारदा सिन्हा का निधन संगीत की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनके पैतृक गांव सुपौल जिले के राघोपुर प्रखंड के हुलास में छठ पर्व के उत्सव के बीच यह दुखद समाचार पहुंचते ही शोक की लहर दौड़ गई।

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प्रारंभिक जीवन और संगीत में शुरुआती सफर
शारदा सिन्हा का जन्म सुपौल जिले के हुलास गांव में एक साधारण परिवार में एक अक्तूबर 1952 को हुआ था। उनके पिता, दिवंगत सुखदेव ठाकुर बिहार सरकार के शिक्षा विभाग में संयुक्त सचिव के पद पर कार्यरत थे और उन्हें शिक्षा के प्रति बेहद लगाव था। शारदा को बचपन से ही गायन में रुचि थी और उनके पिता ने इस प्रतिभा को पहचानते हुए उनके संगीत प्रशिक्षण का प्रबंध किया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुलास गांव के राधानगर मध्य विद्यालय में हुई। पड़ोसी गांव के शिक्षक रामचंद्र झा से उन्होंने संगीत की शुरुआती शिक्षा ली, इसके बाद विलियम्स उच्च विद्यालय के संगीत शिक्षक पंडित रघु झा से उन्होंने गहरे संगीत के गुर सीखे।
 

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शारदा सिन्हा की चचेरी भाभी निर्मला ठाकुर - फोटो : अमर उजाला
शारदा सिन्हा की चचेरी भाभी निर्मला ठाकुर ने बताया कि उनकी पहली प्रस्तुति अपने बड़े भाई की शादी में हुई थी। देहर छेकाई की रस्म के दौरान शारदा ने पहली बार गीत गाया। उसका बोल था ‘द्वार के छेकाई नेग पहिले चुकईयो यो दुलरुआ भईया...’। उनकी इस गायकी ने परिवार के लोगों के दिलों को छू लिया और यहीं से उनकी संगीत यात्रा की शुरुआत हुई।
 
लोक संगीत में एक नई पहचान
शारदा सिन्हा का गायन बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोकगीतों की सजीवता को अपनी आवाज में बांधकर रखने का एक अनोखा हुनर था। मैथिली और भोजपुरी में उनका गाया छठ का गीत ‘केलवा के पात पर उगेलन सूरज देव’ आज भी छठ महापर्व का प्रतीक बन चुका है। विवाह, होली और अन्य पर्वों के गीतों में उनकी आवाज की मधुरता और ठेठ भोजपुरी, मैथिली और मगही का रंग उनकी गायकी में नजर आता था। शारदा सिन्हा ने देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी लोक गायकी की प्रस्तुति दी और कई मंचों पर अपनी आवाज का जादू बिखेरा।
 
उनकी ख्याति इतनी बढ़ी कि उन्हें ‘बिहार कोकिला’ की उपाधि दी गई। उनकी गायकी ने उन्हें पद्मश्री और पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान दिलाए, जिससे बिहार के लोकसंगीत की महत्ता और भी बढ़ गई। शारदा सिन्हा के गीतों ने न केवल बिहार बल्कि पूरे भारत के श्रोताओं के दिलों में जगह बनाई।
 

शारदा सिन्हा के छोटे भाई और भाभी - फोटो : अमर उजाला
जीवन के आखिरी क्षण और अंतिम इच्छा
शारदा सिन्हा की तबीयत पिछले कुछ समय से ठीक नहीं थी और उनका इलाज दिल्ली में चल रहा था। मंगलवार को उनके छोटे भाई पद्मनाभ शर्मा उनसे मिलकर गांव लौट रहे थे, जब रास्ते में उन्होंने उनके निधन का समाचार सुना। परिवार ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनके अंतिम संस्कार की योजना पटना में उनके पति ब्रजकिशोर सिन्हा के समीप करने का निर्णय लिया। उनके छोटे भाई पद्मनाभ शर्मा और परिवार के अन्य सदस्य इस कठिन घड़ी में पटना रवाना हो गए।
 
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शारदा सिन्हा के बचपन के मित्र शिवशंकर ठाकुर - फोटो : अमर उजाला
गांव और परिवार में शोक की लहर
शारदा सिन्हा के निधन की खबर सुनते ही उनके पैतृक गांव हुलास में शोक की लहर दौड़ गई। गांव वाले जो छठ पर्व की तैयारियों में मग्न थे, अचानक इस दुखद समाचार से स्तब्ध रह गए। उनके बचपन के मित्र और पड़ोसी शिवशंकर ठाकुर ने बताया कि शारदा सिन्हा के साथ उन्होंने गांव के मध्य विद्यालय में पढ़ाई की थी। वे अक्सर स्कूल जाते समय रास्ते में गुनगुनाती रहती थीं और उनके चेहरे पर हमेशा एक सजीवता बनी रहती थी। गांव के लोग गर्व महसूस करते हैं कि शारदा सिन्हा जैसी महान गायिका इस गांव से ताल्लुक रखती हैं, जिनकी आवाज हर घर में गूंजती थी।


 
बिहार की संगीत की एक महान हस्ती का अंत
शारदा सिन्हा ने अपने पूरे जीवन में लोक संगीत की परंपराओं को सजीव रखा और अपने गीतों के माध्यम से लोकजीवन की समृद्धि और सादगी को विश्वपटल पर रखा। उन्होंने अपनी आवाज के माध्यम से लोकसंगीत को एक नया आयाम दिया और आज उनकी अनुपस्थिति में लोकसंगीत में जो खालीपन आया है, उसे भरना आसान नहीं होगा। उनके गीत सदियों तक छठ पर्व और अन्य लोकपर्वों में गूंजते रहेंगे, और उनकी आवाज बिहार और देशवासियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी।
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