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Holi 2026: सहरसा में ‘घुमौर होली’ का रंग, कंधों पर सवार होकर खेली जाती है 200 साल पुरानी परंपरा; अनोखा उत्सव

Tue, 03 Mar 2026 02:47 PM IST
कोसी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहरसा

सार

Holi 2026: सहरसा के बनगांव में 200 वर्ष पुरानी ‘घुमौर होली’ ब्रज परंपरा की तर्ज पर होली से एक दिन पहले मनाई जाती है। संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं द्वारा शुरू की गई इस परंपरा में लोग कंधों पर सवार होकर रंग-गुलाल संग फाग गीतों पर उत्साह से झूमते हैं।
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होली 2026 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बिहार के सहरसा जिला मुख्यालय से करीब आठ किलोमीटर पश्चिम स्थित बनगांव नगर पंचायत की होली पूरे देश में अपनी अलग और विशिष्ट पहचान रखती है। ब्रज की परंपरा की तर्ज पर खेली जाने वाली यहां की ‘घुमौर होली’ बेमिसाल है। खास बात यह है कि जब देशभर में होली मनाई जाती है, उससे ठीक एक दिन पहले बनगांव में रंगों का यह उत्सव धूमधाम से मना लिया जाता है।

हर वर्ष की तरह इस बार भी परंपरा का निर्वहन करते हुए होली से एक दिन पूर्व बनगांव में घुमौर होली का आयोजन हुआ। सैकड़ों की संख्या में जुटे लोग रंग और गुलाल में सराबोर नजर आए। एक-दूसरे के कंधों पर सवार होकर लोगों ने जोर-आजमाइश की और फाग गीतों की मधुर धुन पर जमकर झूमे।

200 साल पुरानी परंपरा, संत लक्ष्मीनाथ ने की थी शुरुआत

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बताया जाता है कि 18वीं सदी में यहां के प्रसिद्ध संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं बाबाजी ने इस अनोखी परंपरा की शुरुआत की थी। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस तरह की होली की जड़ें भगवान श्रीकृष्ण के काल से भी जुड़ी मानी जाती हैं। तीन पंचायतों और बड़ी आबादी वाले बनगांव की यह होली बिहार की सांस्कृतिक विरासत का अनूठा उदाहरण बन चुकी है।

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सामाजिक समरसता और भाईचारे की मिसाल

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ग्रामीणों का कहना है कि बनगांव की होली सिर्फ रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और भाईचारे की प्रतीक है। यहां सभी जाति और धर्म के लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ होली खेलते हैं। रोजगार या शिक्षा के सिलसिले में देश-विदेश में बसे गांव के लोग भी इस मौके पर अपने घर लौटते हैं, ताकि इस पारंपरिक उत्सव का हिस्सा बन सकें।

भगवती स्थान पर होता है समापन
घुमौर होली का जुलूस गांव की गलियों से गुजरते हुए अंत में ‘भगवती स्थान’ पहुंचता है। मान्यता है कि जब तक यहां आकर होली नहीं खेली जाती, तब तक यह पर्व अधूरा माना जाता है। ग्रामीणों के अनुसार बाबा लक्ष्मीनाथ के आशीर्वाद से 200 वर्षों के इतिहास में इस आयोजन के दौरान कभी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। यही कारण है कि हर वर्ष यह परंपरा और अधिक आस्था व उत्साह के साथ निभाई जाती है।

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