चार दिवसीय छठ महापर्व की शुरुआत मंगलवार से नहाए-खाए के साथ होगी, जिसमें श्रद्धालु सूर्य भगवान को अर्घ्य देंगे। इस अवसर पर सहरसा जिले के महिषी प्रखंड के कन्दाहा गांव का प्राचीन सूर्य मंदिर खास आकर्षण का केंद्र होगा। यह मंदिर, जो द्वापर युग से अस्तित्व में है, भारत के सबसे प्राचीन सूर्य मंदिरों में से एक है। इसे ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से ओडिशा के कोणार्क के बाद दूसरा स्थान दिया गया है। इसकी अद्वितीय मूर्तियां और स्थापत्य शैली इसे एक विशेष धार्मिक स्थल बनाती हैं।
कन्दाहा सूर्य मंदिर की स्थापना के संबंध में सूर्य पुराण में उल्लेख है कि भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब को कुष्ठ रोग से मुक्ति पाने के लिए बारह स्थानों पर सूर्य मंदिर स्थापित करने का निर्देश दिया गया था, जिसमें से एक मंदिर यहां भी स्थापित हुआ। इस मंदिर में काले पत्थर से बनी सूर्य देव की आदमकद प्रतिमा और उनकी पत्नियों संज्ञा तथा छाया की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर की दीवारों पर अंकित कलाकृतियां खजुराहो की शिल्पकला से मेल खाती हैं, जो इसके ऐतिहासिक महत्त्व को बढ़ाती हैं।
कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कब और किसने करवाया, इसके प्रमाण नहीं मिलते। लेकिन मंदिर का पुनर्निर्माण 1334 ई. में इनवार वंश के राजा भवदेव सिंह ने करवाया था। इस कारण इसे भवदित्य नाथ सूर्य मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर में कई पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनसे इसके प्राचीन इतिहास का पता चलता है। मंदिर परिसर में एक विशेष कुएं का भी उल्लेख है, जिसके जल को चर्म रोग और सफेद दाग के उपचार के लिए प्रभावी माना जाता है।
दूर-दूर से श्रद्धालु इस मंदिर में अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और उन्हें यह विश्वास है कि सूर्य देवता उनकी इच्छाएं अवश्य पूरी करते हैं। बिहार के छठ पर्व के दौरान इस मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि इस पर्व में अस्त और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। हालांकि, इस ऐतिहासिक स्थल की ख्याति आज भी गुमनामी के अंधेरे में है। प्रशासनिक उपेक्षा के कारण कन्दाहा सूर्य मंदिर को वह पहचान नहीं मिल पाई है जैसी कोणार्क मंदिर को प्रसिद्धि मिली है। अगर सरकार इस दिशा में पहल करे, तो यह मंदिर भी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के मानचित्र पर उभर सकता है।
मंदिर के पुजारी और स्थानीय लोग बताते हैं कि कन्दाहा सूर्य मंदिर द्वापर युग से लेकर आज तक सूर्य देवता के प्रत्यक्ष प्रमाण स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित है। यह सूर्य उपासना का अनोखा प्रतीक है, परंतु प्रशासनिक उदासीनता ने इसे राष्ट्रीय मानचित्र पर वह प्रतिष्ठा नहीं दिलाई जो इसकी अद्वितीयता के अनुरूप है।