बिहार में पहले चरण का मतदान नजदीक है। उम्मीदवार मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे हैं।
अधिकतर जगहों पर उम्मीदवार खुद से ज्यादा अपने नेतृत्व के काम और नाम का जिक्र कर रहे हैं। वोटर भी उम्मीदवार से ज्यादा पार्टी और दल को महत्व देते दिख रहे हैं। इसके पीछे कारण भी साफ है।
जनता के सामने सभी उम्मीदवार आज बराबर हो चुके हैं। वो जानते हैं कि काम न तो ये करनेवाले है न वो। जो काम होने हैं वो रूटीन विकास के तहत ही होंगे, उसमें सांसद कोई रहे फर्क नहीं पड़ता।
मतदाताओं की इस उदासीनता को बड़े नेता भी हवा दे रहे हैं। शहरों में चर्चा का मूल तत्व व्यक्ति बन चुका है। नरेंद्र मोदी, राहुल, नीतीश और लालू के ऊपर ही पूरी बहस हो रही है।
मंच से भी जो आवाजें आ रही हैं उनमें भी नीति की जगह व्यक्ति की आलोचना की जा रही है। एक दूसरे की आलोचना और वादे के अलावा कोई नीति में बदलाव की बात नहीं कर रहा।
मुद्दा विहीन होते इस चुनाव में जनता भी जानती है कि सरकारें चाहे कितनी भी बदल जाएं, नीतियां नहीं बदलने वाली।
बिहार में साक्षरता दर बढ़कर 63% से ऊपर पहुंच गई है। गांवों में अशिक्षित तबका जहां वोट देते वक्त अपनी जरूरत को देख रहा है, वहीं शहरों का शिक्षित तबका नेतृत्व परिवर्तन और आरोप-प्रत्यारोप का मूल्यांकन करने में लगा हुआ है। शहर में साक्षरता दर 71% है जिसमें महिलाएं 62% और पुरुष 80% तक साक्षर हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों की साक्षरता दर 43% है, जिनमें 57% पुरुष और 29% महिलाएं साक्षर हो चुकी हैं।
इसके बावजूद अशिक्षित वर्ग ही मुद्दे उठा रहे हैं, शिक्षित तो आरोपों में उलझ कर रह गए हैं। वैसे इतिहास पर गौर करें तो बिहार में स्थानीय मुद्दों पर कम ही चर्चा होती रही है।
देश की सरकार, देश का नेता चुनना ही यहां की परंपरा रही है। लेकिन इस बार स्थानीय मुद्दों के साथ साथ राष्ट्रीय मुद्दे भी बहस से नदारद हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में जरूर कुछ स्थानीय मद्दे जैसे सड़क, बिजली, पानी और रोजगार पर चर्चा होती दिख रही है, लेकिन शहरी क्षेत्र नेताओं के व्यक्तिगत आरोपों की आंधी में बह गया है।
यहां वोटर स्थानीय मद्दे पर बात नहीं करते, वो नेतृत्व को परखने में विश्वास कर रहे हैं। शहरों से मुद्दे गायब हो चुके हैं। ऐसे में गांव और शहर के बीच फासला बढ़ता दिख रहा है।