नीतीश कुमार-प्रशांत किशोर (फाइल फोटो)
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आखिरकार बगावती तेवर दिखाने वाले पार्टी उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर और पूर्व राज्यसभा सदस्य पवन वर्मा को जेडीयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
ये वही प्रशांत किशोर हैं, जिनकी रणनीति के दम पर कभी नीतीश ने चुनावों में सफलता का स्वाद चखा था। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के चुनावी अभियान को धार दी। इसके बाद वह नीतीश कुमार के साथ जुड़ गए। दोनों के बीच इतनी छनी कि 2018 में पीके सीधे जेडीयू उपाध्यक्ष बना दिए गए। पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं को यह बात खटकी, लेकिन...।
मगर समय के साथ नीतीश और पीके के बीच गतिरोध बढ़ता चला गया है। यह खटास धीरे-धीरे इतनी बढ़ती चली गई कि सार्वजनिक मंचों पर दोनों नेता एक-दूसरे की आलोचना करते रहे। नीतीश ने बार-बार दोहराया कि जो जाना चाहता है, वो जा सकता है। वहीं प्रशांत किशोर ने भी समय-समय पर ट्विटर के माध्यम से तंज कसने का कोई मौका नहीं छोड़ आया।
मंगलवार को प्रशांत किशोर ने नीतीश को झूठा तक बता दिया। इसके बाद नीतीश का सब्र का बांध टूटा और बुधवार को पीके को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उनके साथ पवन वर्मा की भी छुट्टी हो गई। आइए जानते हैं कि आखिर क्या वजह रहीं, जिस वजह से प्रशांत किशोर को पार्टी से बाहर किया गया...
- नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) पर प्रशांत किशोर ने जेडीयू से अलग राय रखी। जेडीयू ने इसका समर्थन किया था जबकि पीके ने इसका विरोध किया।
- प्रशांत किशोर ने कई मौकों पर बिहार में जेडीयू के सहयोगी दल भाजपा के खिलाफ भी बयान दिए।
- सीएए पर प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के रुख की भी तारीफ की।
- भाजपा नेता सुशील मोदी पर तंज कसते हुए पीके ने कहा था, 'लोगों को चरित्र प्रमाण पत्र देने में उनका कोई जवाब नहीं है।'
अन्य पार्टियों का चुनावी अभियान संभाला
- प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, बिहार में नीतीश, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी का चुनाव प्रचार भी संभाला।
- पीके की कंपनी आई-पैक वर्तमान में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के लिए काम कर रही है।
इन ट्वीट से बढ़ती गईं दूरियां