लॉकडाउन का असर चुनावों पर साफ दिख रहा है। दूसरे राज्यों से तमाम मुश्किलें झेलकर वापस आए यहां के मजदूरों का मूड भांपते हुए प्रत्याशी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मुद्दे को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। खास कर मैदान में उतरे युवा प्रत्याशियों को यहां की नई राजनीति का अंकुरण कहा जा सकता है।
‘विकास एक अहम एजेंडा’
पटना हाईकोर्ट में वकालत और राज्य महिला आयोग की सदस्य रहीं और बक्सर की डुमरांव विधानसभा सीट से जदयू प्रत्याशी अंजुम आरा जनता से मिलने पर सबसे पहले विकास और तरक्की की बात करती हैं। वह कहती हैं, “जनता चुनती ही है विकास के मुद्दे पर। वर्ष 2005 के पहले का बिहार एक बदहाल बीमारू और देश के ऊपर बोझ माना जाने वाला राज्य था। जो आज विकासशील राज्य है और अगले पांच वर्षों में हम इसे विकसित राज्य बनाएंगे। विकास एक अहम एजेंडा होता है और हमारी सरकार का नारा यही है।”
जदयू प्रत्याशी अंजुम आरा कहती हैं, “हमारे मुद्दे हैं इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर रोजगार और सर्वांगीण मानव विकास। रही बात बिहार में फैक्ट्रियों के न होने की और रोजगार के लिए युवाओं के बाहर जाने की, तो 2005 तक स्थिति यह थी कि इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था, उसमें सुधार आया है। हमारी सरकार ने हर घर तक बिजली और पानी पहुंचा दिया है। सड़कें अच्छी हो गई हैं। अब रोजगार भी बढ़ेंगे। सभी को सरकारी नौकरी दे पाना संभव नहीं है, युवाओं के कौशल का विकास करके रोजगार देने पर ज्यादा जोर है।”
राजद के घोषणा पत्र को झूठे वादे करार देतीं अंजुम आरा कहती हैं, “तेजस्वी यादव जो 10 लाख युवाओं को रोजगार देने की बात कह रहे हैं, वो जनता को गुमराह करने वाली बात है। पहले वो ये बताएं कि दस लाख रोजगार बिहार सरकार के पास हैं कहां?
‘कमजोर शिक्षा प्रणाली बदलनी होगी’
बक्सर की डुमरांव विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे शिवांग विजय सिंह राजघराने से ताल्लुक रखते हैं। देहरादून के एक नामी कॉलेज से पढ़ाई के बाद अपने परिवार की विरासत संभालने वाले शिवांग कहते हैं, “हमें लोगों के प्यार ने बुलाया है। जनता ने देख लिया कि धरातल पर काम नहीं हो रहा है। युवा बेरोजगार है, जब शिक्षा प्रणाली ही यहां की कमजोर है तो रोजगार कहां हो सकता है? प्राइमरी स्कूल तक पढ़ाई है लेकिन उसके बाद कालेज की दिक्कत। जब शिक्षा और रोजगार नहीं होगा तभी तो लोग पलायन करके बाहर जा रहे हैं।
आज शिक्षा और चिकित्सा की बहुत जरूरत है। दोपहर दो बजे तक अस्पतालों में डॉक्टर नहीं आते। बिहार को हम एक प्रोग्रेसिव राज्य बनाना चाहते हैं। हम सम्राट अशोक के समय जो पाटलिपुत्र हुआ करता था, उस बिहार को फिर से देखना चाहते हैं।”
‘राजनीति का विमर्श भी बदलना चाहिए’
बिहार में वामपंथी दलों का कुछ खास जिलों पर काफी प्रभाव रहता है, उनमें से एक है बक्सर। महागठबंधन की ओर से बक्सर की डुमरांव विस सीट से भाकपा (माले) के युवा उम्मीदवार अजीत कुशवाहा ने पीएचडी तक शिक्षा ली है। अजीत कहते हैं, “बिहार में आज युवा को लगता है कि आने वाले समय में हम युवा राजनेता ही इनकी तकदीर बदलेंगे। आज और कोई विकल्प ही नहीं है तब जाकर रोजगार के सवाल पर चुनाव हो रहा है। हमें रोजगार नहीं मिलेगा तो क्या विकास होगा? दरवाजे तक पक्की सड़क है और घर में दाल नहीं है तो उसका क्या मतलब। पहला सवाल घर में दाल-रोटी होनी चाहिए। जिसे लोग समझ रहे हैं।”
एक गांव में कैंपेन के दौरान युवाओं की भीड़ से घिरे अजीत कुशवाहा कहते हैं, “ये चुनाव नीतीश कुमार के 15 साल के राज और महागठबंधन के बीच हो रहा है। यह सिर्फ चुनाव जीतने की राजनीति नहीं है, हम राजनीति के विमर्श को भी बदलना चाहते हैं। हम लोगों से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर बात करते हैं। अगर लोगों को लग रहा है कि उनका विकास होना चाहिए तो उन्हें मुद्दों पर ध्यान देना होगा। इस चीज को लॉकडाउन ने बखूबी समझा दिया है।”
अजीत आगे कहते हैं, “लोगों के अधिकार खत्म हो गए हैं, शिक्षकों को समान काम का समान वेतन नहीं मिल रहा है। आशाकर्मियों को कितना कम दिया जाता है, जबकि महंगाई का आलम यह है कि 50 रुपया किलो आलू बिक रहा है।